ये चमगादड़ दोस्त भी हैं / कोरोना नहीं फैलाते इन्वयारमेंट बचाते हैं

Corona does not spread, save the environment
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Corona does not spread, save the environment

  • नुकसान नहीं पहुंचाते पर दूरी जरूरी है

दैनिक भास्कर

Jun 05, 2020, 04:00 AM IST

भागलपुर. ये ईको-फ्रेंडली चमगादड़ हैं और पौधों के परागण में सहयोग करते हैं। राज्य के अधिकतर जगहों पर आसानी से मिल जाते हैं। इन्हें इंडियन फ्रूट बैट्स या इंडियन फ्लाइंग फॉक्स भी कहा जाता है। इस प्रकृति के चमगादड़ पेड़ों या अन्य जगहों पर दिन में कॉलोनी के रूप में आराम करते और शाम या रात में धूमते हैं। ये फल खाते हैं और इनके अपशिष्ट पौधों में परागण में उपयोगी होते हैं। ये ईको फ्रेंडली हैं। ये कीटभक्षी चमगादड़ से अलग हैं और काटते नहीं हैं। टीएमबीयू के पीजी जूलॉजी के डॉ. डीएन चौधरी ने बताया, जब तक ये चमगादड़ संक्रमित नहीं होते तब तक इनसे मनुष्यों को कोई खतरा नहीं होता है। अभी कोरोनाकाल में ये जीवित हैं तो इसका मतलब है कि संक्रमित नहीं हैं। संक्रमित होंगे तो जिस पेड़ पर हैं वहीं मर कर गिरने लगेंगे। चीन से फैले कोरोना के लिए चमगादड़ को भी कारण बताया जा रहा है लेकिन इंडियन फ्रूट बैट्स कोरोना वायरस के वाहक नहीं हैं। ये तब वाहक हो सकते हैं जब कोई कोरोना संक्रमित व्यक्ति इनके संपर्क में आए। इसलिए इनसे दूरी जरूर बनाए रखें, लेकिन इन्हें बेवजह मारने या दूसरी जगह भगाने की कोशिश न करें। 

एक चमगादड़ हर रोज 1200 मच्छर खाता है। मलेरिया, चिकनगुनिया, डेंगू, मेनेजाइटिस से बचने में मदद करते हैं।
खेतों को नुकसान पहुंचाने वाले कीड़े-मकौड़ों को अपना भोजन बनाते हैं। फसलें बचती हैं। 

चमगादड़ इंसान का खून नहीं चूसते। कीड़े-मकोड़े, फल, मेंढक, मछली और फूलों के पराग को भोजन बनाते हैं।

चमगादड़ भोजन के लिए रोज 12 किम. रेडियस में घूमते हैं। यह पर्यावरण व जैव विविधता के लिए अहम हैं।

धरहरा...इसी गांव में बेटियों के जन्म पर पेड़ लगाने  की परम्परा है, यहीं एक पेड़ पर सैकड़ाें चमगादड़ाें ने अपना बसेरा बनाया है। पर्यावरण के संरक्षण व संवर्धन के लिए देश व दुनिया में इस गांव ने मिसाल पेश की है। 

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