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  • Dhak, Who Has Been Playing In Worship For Two Generations, Comes From Virbhum; They Play Dhak In The Festival And Do Farming For The Rest Of The Time, A Team Of 14 People Is Playing Dhak In The Worship Pandals Of The City.

पंरपरा:दो पीढ़ी से पूजा में बजा रहे ढाक, वीरभूम से आती है टोली; त्योहार में ढाक बजाते हैं और बाकी समय करते हैं खेती, शहर के पूजा पंडालों में 14 लोगों की टीम बजा रही है ढाक

भागलपुर2 महीने पहले
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आदमपुर चौक के पंडाल में ढाक बजाते अप्पू दास और उनकी टीम। - Dainik Bhaskar
आदमपुर चौक के पंडाल में ढाक बजाते अप्पू दास और उनकी टीम।

दुर्गा पूजा में ढाक (एक प्रकार का वाद्य यंत्र) का बड़ा महत्व है। खास कर जहां बांग्ला विधि से पूजा होती है, वहां ढाक का बजना तय होता है। ढाक बजाने वाले लोगों को ढाकी कहा जाता है। शहर के कई पूजा-पंडालों में बांग्ला विधि से पूजा होती है और यहां ढाक बजाने के लिए पश्चिम बंगाल के वीरभूम जिले से लापुर गांव से ढाकी आते हैं।

इस बार लापुर से 14 ढाकी की टीम शहर के अलग-अलग पूजा-पंडालों में ढाक बजा रही है। आदमपुर चौक पर बने पूजा-पंडाल में लापुर से आए अप्पू दास और उनकी टीम पष्ठी से ढाक बजा रहे हैं। अप्पन ने बताया कि गांव में करीब 50 ऐसे युवा हैं, जो ढाक बजा कर जीवन-यापन करते हैं।

दुर्गा पूजा, काली पूजा, जगद्धात्री पूजा, लक्खी पूजा, सरस्वती, पूजा आदि मौकों पर ढाक की मांग होती है। त्योहार को छोड़ बाकी दिनों में अप्पू और उनके जैसे लापुर के युवा खेती करते हैं। अप्पू ने बताया कि उसने अपने पिता स्व. धीरज दास से ढाक बजाना सीखा है।

आदमपुर के अलावा मारवाड़ी पाठशाला व एक अन्य पूजा पंडाल में भी लापुर के ढाकी पूजा में ढाक बजा रहे हैं। भागलपुर के अलावा कोलकाता व बंगाल के अन्य हिस्सों में भी जाकर अप्पू और उनकी टीम ढाक बजा चुकी है। एक टीम को बुक करने का खर्च 12 हजार रुपए है, जिसमें 2 ढाकी और एक घंटी बजाने वाला रहता है। एक टीम पष्ठी से लेकर विजया दशमी और विसर्जन तक रहती है।

पूजा और आरती के समय बजाया जाता है ढाक
ऐसी मान्यता है कि दुर्गा पूजा में मां के पूजन और आरती के समय ढाक बजाना शुभ माना जाता है। बांग्ला विधान के अलावा बिहार-झारखंड में ढाक की जगह ढोल बजाने की परंपरा है।

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