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13 साल बाद भी नहीं मिले सबूत:मेंहीं आश्रम में संन्यासी हत्याकांड, साक्ष्य के अभाव में सभी आरोपी बरी

भागलपुर3 महीने पहले
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  • 22 जुलाई 2008 को आश्रम में दयानंद दास को लगी थी गोली, मायागंज अस्पताल में इलाज के दौरान हुई थी मौत

कुप्पा घाट स्थित मेंहीं आश्रम में 2008 में शिष्य दयानंद दास को किसने गोली मारी, इसका खुलासा 13 साल बाद भी नहीं हो सका। नतीजतन, एडीजे-12 शरद चंद्र श्रीवास्तव की अदालत ने शनिवार को हत्याकांड के नामजद तीन व एक अन्य को सबूतों के अभाव में रिहा कर दिया। कोर्ट ने चार्जशीटेड महामंत्री कुरमेश्वर सिंह, व्यवस्थापक उदय महापात्रा और स्वामी आशुतोष के अलावा सेवादार बमबम को दोषमुक्त कर दिया।

दयानंद दास की इलाज के दौरान 22 जुलाई 2008 को मायागंज अस्पताल में हो गई थी। इस मामले में बचाव पक्ष से आनंद श्रीवास्तव और सरकार की ओर से एपीपी दीप कुमार ने बहस की। इस मामले में एक नामजद राजेंद्र सिंह ने संज्ञान के बाद हाईकोर्ट में एफआईआर क्वैशिंग की अपील की थी। जहां उन्हें जीत मिली थी।
सुपौल के थे दयानंद दास, आश्रम में अधिवासी संन्यासी के रूप में रहते थे
22 वर्षीय दयानंद दास मूलत : सुपौल के करजाइन बाजार के बसावन पट्‌टी गांव के रहने वाले थे। वे मेहीं आश्रम में अधिवासी संन्यासी के रूप में रहते थे। मायागंज अस्पताल के बेड नंबर 11 पर इलाजरत दयानंद दास ने मौत से पहले जख्मी हालत में दयानंद दास ने बरारी के एसआई अरुण कुमार राय को घटना की पूरी जानकारी दी थी। उसने पुलिस को बताया कि रात करीब दो बजे गुरु महाराज की समाधि स्थल के पूरब दक्षिण तरफ बने कमरा नंबर 3 में प्रतिदिन की तरह सोये हुए हैं।

उनकी अचानक नींद टूटी तो देखा कि दरवाजा खुला हुआ है। वे दरवाजा बंद करने के लिए उठने वाले थे कि एक फायरिंग हुई और गोली उनके कमर के पीछे लग गई। वे जख्मी होकर वहीं गिर गए और चिल्लाने लगे। लेकिन कोई मदद के लिए नहीं आया। तब उन्होंने आश्रम के बाहर घर बनाकर रह रहे दोस्त पंकज दास को बुलाया। वे आए और उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया।
आशुतोष बाबा के उत्तराधिकारी बनने का करते थे विरोध, बागी पंकज के मित्र थे: दयानंद ने पुलिस को बताया था कि उन्हें नामजद लोग आश्रम से निकालना चाहते थे। क्योंकि आश्रम की सारी जानकारी उनके पास थी और वे स्वामी आशुतोष महाराज के उत्तराधिकारी बनने का विरोध करते थे। पंकज को आश्रम से निकाले जाने पर वे आशुतोष बाबा को प्रणाम आदि भी नहीं करते थे। जिससे आशुतोष महाराज उनसे गुस्सा करते थे। एक महीना पहले भी उन्हें आश्रम से निकालने का प्रयास किया गया था। क्योंकि गुडफेथ में उत्तम दास ने बताया था कि आश्रम से निकल जाओ, नहीं तो ठीक नहीं होगा। उन्होंने दावा किया था कि एक साजिश के तहत उन्हें आश्रम के लोगों ने ही गोली मारी है। उन्होंने पुलिस को दिए गए बयान पर दस्तखत भी किया था।

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