बायोडायवर्सिटी का नायाब नमूना है भागलपुर:भौगोलिक और सांस्कृतिक परिवेश शानदार, एशिया का इकलौता डॉलफिन अभ्यारण

भागलपुर3 महीने पहले
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डॉ.दीपक दीनकर, पीआरओ, टीएमबीयू - Dainik Bhaskar
डॉ.दीपक दीनकर, पीआरओ, टीएमबीयू

जैव विविधता का मानव जीवन में विशेष महत्व है। बगैर जैव विविधता के पृथ्वी पर जीवन संभव नहीं है। उक्त बातें टीएमबीयू के पीआरओ व राजनीति विज्ञान के सहायक शिक्षक डॉ दीपक कुमार दिनकर ने बताया कि जैव विविधता यानी 'बायोडायवर्सिटी' जीवों के बीच पायी जाने वाली विविधता यानी विभिन्नता है जो कि प्रजातियों में, प्रजातियों के बीच और उनके पारिस्थितिकी तंत्रों की विविधता को भी समाहित करती है। व्यक्ति और प्रकृति का सम्बंध काफी गहरा और पुराना है। हमारा जीवन ही प्रकति-पर्यावरण पर आधारित है। खासकर जल, जंगल, जमीन, जानवर और जन] ये पांच महत्वपूर्ण चीजें हमारे मानव जीवन का आधार है। इन सबों के बीच संतुलन और उचित समन्वय बेहद जरूरी है। इन सब का एक दूसरे के साथ अन्योन्याश्रय सम्बन्ध भी है। इसका समुचित संतुलन ही पर्यावरण की उत्कृष्टता को दर्शाता है।

जैवविविधता संरक्षण के लिए अनुकूल है भागलपुर का पर्यावरण

भागलपुर की भौगोलिक स्थिति को प्रकृति-पर्यावरण के लिहाज से बेहतर मानी जा सकती है। गंगा नदी के किनारे स्थित भागलपुर बिहार के सबसे पुराने कमिश्नरी और जिला में शुमार है। यहां की संस्कृति पर काफी हद तक बांग्ला कल्चर का भी प्रभाव रहा है।

भागलपुर गांगेय डॉल्फिन अभ्यारण को जैव विविधता संरक्षण की दिशा में काफी महत्वपूर्ण माना जा सकता है। गंगा नदी में अठखेलियाँ करती डॉलफिन बरबस सबों का अपनी ओर ध्यान आकृष्ट करती है। हालांकि, डॉलफिन के संरक्षण को लेकर अभी और भी सार्थक प्रयास की जरूरत है।

सुलतानगंज से कहलगांव तक 60 किमी अभ्यारण है घोषित
भागलपुर में एशिया महादेश का इकलौता डॉलफिन अभ्यारण है। सुल्तानगंज से लेकर कहलगांव के बीच करीब 60 किलोमीटर क्षेत्र को डॉलफिन अभ्यारण घोषित किया गया है। ढाई दशक बाद भी डॉल्फिन अभ्यारण्य को लेकर कोई ठोस मैनेजमेंट प्लान नहीं बन सका है। जिसके कारण डॉलफिन के संरक्षण और संवर्द्धन को लेकर संशय बना हुआ है। विलुप्त होती जा रही डॉलफिन जैसी संकटग्रस्त प्रजातियों के संरक्षण की ओर विशेष ध्यान देने की जरूरत है ताकि प्रकृति-पर्यावरण के इस महत्वपूर्ण जीव को बचाया जा सके। दरअसल गंगा में जलस्तर की कमी, गाद के बढ़ने आदि कारणों से जलीय जीव-जंतुओं पर खतरा मंडरा रहा है। जिले के सुल्तानगंज, शाहकुंड, कहलगांव, पीरपैंती आदि क्षेत्रों की भौ्गोलिक स्थिति और संरचना भी पर्यावरण के अनुकूल मानी जा सकती है। झारखंड की सीमा से सटे होने के कारण उन इलाकों में वनों की संख्या भी पर्याप्त है।

क्या है जैव विविधता अधिनियम, 2002?

भारत में जैव विविधता अधिनियम को वर्ष 2002 में अधिनियमित किया गया था। इसका उद्देश्य जैविक संसाधनों का संरक्षण, इनके धारणीय उपयोग का प्रबंधन और स्थानीय समुदायों के साथ उचित व न्यायसंगत साझाकरण तथा भारत की समृद्ध जैव विविधता को संरक्षित रखकर वर्तमान और भावी पीढ़ियों के कल्याण के लिये इसके लाभ के वितरण की प्रक्रिया को सुनिश्चित करना है। इसका लक्ष्य जैविक संसाधनों और सम्बद्ध ज्ञान का संरक्षण करना है और सम्बन्धित नियमों तथा अधिसूचनाओं जैसे राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण (एनबीए) की स्थापना करना, कोष के प्रयोजन आदि है।

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