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  • When Gautam Buddha Fell Ill, Emperor Bimbisara Of Magadha Himself Came To Champa, The Capital Of Anga, To Take Sheared Rice For His Diet.

मकर संक्रांति पर विशेष:गौतम बुद्ध बीमार पड़े तो उनके पथ्य के लिए कतरनी चावल लेने मगध के सम्राट बिम्बिसार खुद आये थे अंग की राजधानी चंपा

भागलपुर4 दिन पहले
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अंगभूमि भागलपुर के ऐतिहासिक, सांस्कृतिक एवं सामाजिक जीवन में विशिष्ट स्वाद, सुगंध व गुणवत्ता के कारण कतरनी चावल का सदियों से महत्वपूर्ण स्थान है। यही कारण है कि बिना कतरनी चावल के यहां का कोई भी धार्मिक व सामाजिक अनुष्ठान अधूरा माना जाता है। कतरनी चूड़ा की अहमियत इतनी है कि स्थानीय लोग मकर संक्रांति पर्व को दही-चूड़ा कहकर बुलाते हैं। मकर संक्रांति में खिचड़ी के लिए कतरनी चावल का विशेष महत्व है।

चीनी यात्री ह्वेनसांग के यात्रा संस्मरणाें में भी है इसका उल्लेख

विभिन्न ग्रंथों में पिछले तकरीबन 2500 वर्षों से अंग और इसकी राजधानी रही चंपा के कतरनी चावल की महत्ता व इसकी गुणवत्ता के उल्लेख बौद्ध जातकों व बौद्ध ग्रंथ अवदान कल्पलता सहित इतिहासकार बील के रिकार्ड्स, चीनी यात्री ह्वेनसांग के यात्रा-विवरणों तथा हारडे और एनएल डे के आलेखों में मिलते हैं।

चंपा नदी के निर्मल जल और इसके तटों की उर्वर भूमि के संयोग से उत्पादित अंग का कतरनी चावल आम जनों के अलावा विभिन्न राजे-महाराजाओं और यहां तक कि गौतम बुद्ध का पसंदीदा भोज्य पदार्थ रहा। यही कारण है कि बुद्ध के जीवन के अंतिम दिनों में उनके पथ्य के लिए यहां के सुस्वादु व सुपाच्य कतरनी चावल लेने मगध सम्राट बिम्बिसार स्वयं चंपा अाए थे। बिम्बिसार बुद्ध के परम अनुयायी थे।

चंपा का धनाढ़्य व्यक्ति सोण थे कतरनी चावल के बड़े उत्पादक

सुप्रसिद्ध इतिहासकार एनएल डे 1914 में बंगाल एशियाटिक सोसायटी के जर्नल में प्रकाशित नोट्स ऑन एनशिएंट अंग ऑर द डिस्ट्रिक्ट ऑफ भागलपुर शीर्षक आलेख में बताते हैं कि रामायण में भी अपने विशिष्ट प्रकार के चावल उत्पाद के कारण अंग के प्रसिद्ध होने की बात कही गई है। इतिहासकार हारडे के अनुसार अंग में कतरनी चावल का मुख्य उत्पादक यहां की राजधानी चंपा का धनाढ़्य व्यक्ति सोण था, जो और कोई नहीं बल्कि बौद्ध थेरगाथाओं के लेखकों में से एक था। ह्वेनसांग ने सोण को श्रुतिविंश कोटि कहा है। जबकि बौद्ध ग्रंथ अवदान कल्पलता में उन्हें श्रोणकोटि विंश बताया गया है। किंतु विद्वानों की मीमांसा के अनुसार ये तीनों नाम एक ही व्यक्ति के हैं, क्योंकि पाली भाषा में श्रोण को सोण कहा जाता है। इतिहासकार एनएल डे अपने आलेख में कहते हैं कि मान्यताओं के अनुसार जब भगवान बुद्ध अपने जीवन के अंतिम दिनों में बीमार पड़े थे, तो उनके पथ्य के लिये कतरनी चावल लाने के लिए स्वयं मगध सम्राट बिम्बिसार अंग की राजधानी चंपा के सोण से मिले थे। सोण बुद्ध के प्रसिद्ध शिष्यों में एक माने जाते हैं।

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