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रोजगार की तलाश:बीते 6 माह से नहीं मिला महीने में 10 दिन भी काम

सहरसा10 दिन पहले
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  • दर्द उन मजदूरों का जिनकी जिंदगी सुधारने का दावा हर कोई करता है
  • महीने में 20 से 22 दिन लेबर मंडी से खाली हाथ लौटते हंै ज्यादातर मजदूर
  • हटिया गाछी, इस्लामिया चौक, शंकर चौक और दहलान चौक पर रोजाना सजती है मजदूरों की मंडी, कभी काम मिलता तो कभी लौटते हताश

कोरोना महामारी से पूर्व शहर के चार प्रमुख मजदूर मंडी में सुबह 9 बजे के बाद एक भी मजदूर काम के लिए नहीं रुकते थे, लेकिन आज कोरोना महामारी के दौरान चारों मंडी में दिन के 10:30 बजे तक बड़ी संख्या में मजदूर सड़क किनारे काम के इंतजार में बैठे मिल जाते हैं। 11 बजे तक जब उन्हें कोई भी व्यक्ति काम के लिए बुलाने नहीं आता तो टिफिन के साथ खाली हाथ घर लौट जाते हैं। यह सिलसिला महीने में एक-दो दिन का नहीं बल्कि 20-22 दिन का होता है। ऐसे मजदूर अपनी किस्मत उस दिन अच्छी समझते हैं जिस दिन उन्हें काम मिल जाता है। जो महीने में मात्र 7- 8 दिन ही होता है। जिससे उनके परिवार की गाड़ी किसी तरह खींच रही है। शुक्रवार की सुबह 9 बजे हटिया गाछी मजदूर मंडी पहुंचे कई दर्जन मजदूर सड़क किनारे बैठे काम के लिए इंतजार कर रहे थे। यही हाल इस्लामिया चौक स्थित मजदूर मंडी, शंकर चौक स्थित मजदूर मंडी और दहलान चौक स्थित मजदूर मंडी का था। फिर सुबह के 10 बजे तक हटिया गाछी में सड़क किनारे कई मजदूर खड़े टकटकी लगाए दिखे। पूछने पर सहरसा बस्ती निवासी 55 वर्षीय राजमिस्त्री मो कलाम ने बताया कि शाहीन बाग आंदोलन के बाद से ही काम में कमी आ गई थी। कोरोना काल के बाद तो काम बंद ही हो गया है। बीते लगभग 2 महीने से सरकार द्वारा पूरी तरह लॉकडाउन में ढील दी गई। इसके बावजूद भी महीने में 5-7 दिन से अधिक काम नहीं मिलता। ऐसे में परिवार चलाना मुश्किल है।

रोजाना सुबह सात से 11 बजे तक बैठते हैं मजदूर
शहर के 10 किलोमीटर दूर बैजनाथपुर के गम्हरिया गांव से पहुंचे राजमिस्त्री श्रवण शर्मा, लगभग 11 किलोमीटर दूर खजूरी गांव से पहुंचे भीम रजक, महेश्वर पासवान, कोरलाही गांव से पहुंचे राजाराम शर्मा, राम नेति दास ने भी बताया कि वे लोग प्रतिदिन घर से 7 बजे दो सूखी रोटी को टिफिन में बंद कर हटिया गाछी, इस्लामिया चौक, शंकर चौक और दहलान चौक आकर बैठते है।

कोरोना काल से पहले दूसरे राज्यों में थे
गम्हरिया निवासी विनोद साह, धमसैनी के बबलू शर्मा, हनुमान नगर, चकला टोला निवासी सिंघेश्वर राम, महुआ निवासी अनीश कुमार, कोरलाही के मंटू शर्मा, कचरा निवासी उपेंद्र शर्मा ने बताया कि वे लोग कोरोना से पूर्व दिल्ली, पंजाब व हरियाणा में रोजगार करते थे।

बोले मजदूर : अब फिर से दिल्ली-पंजाब जाना ही पड़ेगा
कोरोना में वे लोग ट्रेन और बसों से धक्के खाकर वापस लौटे। उन्होंने कसम खाया था कि अब पंजाब, दिल्ली व हरियाणा नहीं जाएंगे। लेकिन 5 महीने के दौरान उनकी परिवार की आर्थिक स्थिति काफी चरमरा गई है। लोगों से सुना था कि सरकार उन्हें गांव में ही रोजगार देगी। वे मुखिया-सरपंच के पास भी चक्कर लगाए कहीं कोई रोजगार नहीं मिला। अब फिर दिल्ली, पंजाब-हरियाणा ही जाना पड़ेगा।

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