कार्यक्रम:‘यात्री को संसार के कई भाषाओं में पढ़ा जाता लेकिन उनकी आत्मा मिथिला में बसती थी’

सहरसाएक महीने पहले
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यात्री के स्मृति दिवस पर आयोजित कार्यक्रम में शिरकत करते विद्वतजन। - Dainik Bhaskar
यात्री के स्मृति दिवस पर आयोजित कार्यक्रम में शिरकत करते विद्वतजन।
  • मैथिली-हिन्दी के बहुचर्चित साहित्यकार बैद्यनाथ मिश्र यात्री की स्मृति पर आयोजित हुआ कार्यक्रम

मैथिली एवं हिंदी के बहुचर्चित साहित्यकार बैद्यनाथ मिश्र यात्री की स्मृति दिवस पर शुक्रवार को सुपर बाजार स्थित प्रमंडलीय पुस्तकालय में साहित्यिक, सांस्कृतिक, सामाजिक संस्था मैथिली शब्द लोक के तत्वावधान में ‘यात्री नागार्जुन साहित्य’ विषय पर साहित्यिक परिचर्चा एवं कवि सम्मेलन हुआ। कार्यक्रम का आरंभ यात्री जी को श्रद्धा सुमन कर हुआ। अध्यक्षता करते भाषा विचारक व साहित्यकार डॉ. राम चैतन्य धीरज ने कहा कि यात्री ने विश्व के द्वंद्ववादी दर्शन को ही स्वीकार किया। उन्होंने कहा कि विश्व में एकमात्र वेदांत दर्शन है जो व्यक्ति की मुक्ति की बात करता है। मिथिला में चार दर्शन के अतिरिक्त वेदांत का ज्ञान याज्ञवल्क्य और मंडन मिश्र का दर्शन मिलता है। जब तक व्यक्ति-व्यक्ति मुक्त नहीं होगा तब तक यात्री जी का चिंतन समाज के लिए उपयोगी प्रमाणित नहीं होगा। कार्यक्रम को संबोधित करते हुए उदाकिशुनगंज कॉलेज के प्रधानाचार्य अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. रामनरेश सिंह ने यात्री के जीवन वृतांत पर विस्तार से प्रकाश से डालते हुए उसे मुखर प्रगतिशील साहित्यकार बताया। मैथिली के आलोचक और अनुवादक प्रो. ललितेश मिश्र ने कहा कि बैद्यनाथ मिश्र यात्री की कविताओं में लोक चेतना अथवा समाज चेतना उद्भट रूप से अभिव्यक्त हुई है। मधुबनी से मैथिली अभियानी दिलीप कुमार झा ने कहा यात्री को संसार के कई भाषाओं में पढ़ा जाता है। लेकिन उनकी आत्मा मिथिला में बसती थी। वे सदैव मिथिला हित के लिए चिंतित दिखते थे। इसलिए वैद्यनाथ मिश्र ‘यात्री’ को समझने के लिए मिथिला को समझना होगा। कवि अरविंद मिश्र नीरज ने कहा कि यात्री जी के जीवन में दुख और अभाव का संबंध चोला और दामन का रहा है। कवि डॉ. अरुणाभ सौरभ ने कहा कि मिथिला की जो एक वैदुष्य परम्परा रही है उसकी यात्री एक मजबूत कड़ी थे। साहित्यकार मुक्तेश्वर प्रसाद सिंह ने कहा कि यात्री को स्वामी सहजानन्द और सुभाषचंद्र बोस के प्रति प्रेम था। फलस्वरूप आन्दोलन का मार्ग भी अपनाया। किसान आन्दोलन, फिर चंपारण आंदोलन में भाग लेने के कारण जेल भी गए। दूसरे सत्र में कवि सम्मेलन का आयोजन किया। जिसमें मधुबनी से आये चर्चित कवि दयाशंकर मिथिलांचली के साथ-साथ रघुनाथ मुखिया, विवेकानंद सिंह, सुमन शेखर आजाद, मैथिली अभियानी हरिशंकर तिवारी, भोगेन्द्र शर्मा निर्मल, शैलेन्द्र स्नेही, नीरस झा निरंजन, मैथिल यायावर, मुक्तेश्वर प्रसाद सिंह, अरुणाभ सौरभ, दिलीप कुमार झा, कुमार विक्रमादित्य, मनोज कुमार सिंह, दिलीप कुमार दर्दी, मुख्तार आलम आदि ने स्व रचित कविताओं का पाठ किया।

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