ग्रह:14 जनवरी को मकर संक्रांति, दोपहर 12 से शाम तक रहेगा पुण्यकाल समय

करजाईन11 दिन पहले
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  • सूर्य के एक राशि से दूसरे राशि में प्रवेश करने की प्रक्रिया को कहते है संक्रांति

हर वर्ष की तरह की इस बार भी मकर संक्रांति 14 जनवरी को मनाया जाएगा। मकर संक्रांति पर पुण्य काल शुक्रवार को दोपहर 12 से शाम तक है। यह जानकारी गोसपुर निवासी आचार्य पंडित धर्मेंद्रनाथ मिश्र ने दी। उन्होंने बताया कि जिस काल में संक्रांति है, उससे 16 घड़ी पहले और 16 घड़ी बाद पुण्यकाल मानते हैं। लेकिन मकर संक्रांति को विशेष महत्व देनें के कारण 40 घड़ी बाद तक पुण्यकाल होता है। जब सूर्यदेव एक राशि से दूसरे राशि में प्रवेश करते हैं। उसे संक्रांति कहते हैं। मकर संक्रांति को सूर्य साधना का पर्व माना जाता है। सूर्य प्रत्येक राशि पर एक महीना तक संचार करते हैं। इस प्रकार प्रत्येक माह में प्रत्येक राशि की संक्रांति क्रमशः आती रहती है। इनमें मकर संक्रांति का विशेष महत्त्व है। क्योंकि यह संक्रांति सौम्यायन संक्रांति है। इस दिन भगवान भास्कर उत्तरायण हो जाते हैं। मकरादि छः तथा कर्कादि छः राशियों का भोग करते समय सूर्य क्रमशः उत्तरायण और दक्षिणायन में रहते हैं। इसी दिन से सूर्यदेव के उत्तरायण होने से देवताओं का ब्रह्ममुहूर्त प्रारंभ होता है।

सूर्यदेव के उत्तरायण होने से समय बहुत ही शुभ
अतः उत्तरायण होने पर वे देवताओं एवं दक्षिणायन में पितरों के अधिपति होते हैं। सूर्य बारहों राशियों में प्रवेश करते हैं। इसलिए वर्ष में करीब 11 संक्रांति होती है। दक्षिणायन से उत्तरायण में आने की सूर्य की यह प्रक्रिया और एक राशि से दूसरी राशि में सूर्य के प्रवेश दोनों का संगम ही मकर संक्रांति कहलाती है। सूर्यदेव के उत्तरायण होने के कारण यह समय बहुत ही शुभ माना जाता है। इस पुण्यकाल में दान, व्रत,उपवास, यज्ञ, होम का विशेष महत्त्व है। इस उत्सव के दिन सभी एक दूसरे के घर आते-जाते है और तिल के लड्डू का आदान-प्रदान करते हैं। ताकि आपस में प्रेम-स्नेह बना रहे। यह पर्व साधना के दृष्टिकोण से अधिक महत्वपूर्ण है। इस पर्व के अवसर पर किया गया दान कई गुणा फलों की प्राप्ति कराता है। इसलिए सभी को मकर संक्रांति का पर्व पूर्ण आस्था एवं श्रद्धा के साथ मनानी चाहिए।

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