11 मई से यज्ञ शुरु:जीयर स्वामी बोले- दूसरे का अहित करने पर मिलेगा विपरीत परिणाम

पीरो4 दिन पहले
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प्रवचन करते संत जीयर स्वामी। - Dainik Bhaskar
प्रवचन करते संत जीयर स्वामी।

सहेजनी गांव में श्री लक्ष्मी नारायण काली प्राण-प्रतिष्ठात्मक यज्ञ लक्ष्मी प्रपन्न जीयर स्वामी के सानिध्य में 11 मई से यज्ञ शुरु है। पूर्णाहुति और भंडारा 16 मई को है। अपने प्रवचन में जीयर स्वामी ने कहा कि पूस और चैत माह में कामनायुक्त भागवत कथा का श्रवण नहीं करनी चाहिए। कामना रहित भागवत कथा श्रवण में दोष नहीं है। भागवत कथा श्रवण से हरि चित्त में चिपक जाते हैं। जो बहुत दिनों के योग-तपस्या एवं समाधि से प्राप्त नहीं होता, वह कलियुग में भागवत कथा श्रवण मात्र से होता है।

व्यक्ति को ईश्वर द्वारा प्राप्त शरीर और संसाधनों का कभी दुरुपयोग नहीं करना चाहिए। ऐसा करने से शक्ति और साधन क्षीण होते हैं। समाज, उस व्यक्ति को हेय दृष्टि से देखता है। प्रह्लाद अपने पिता हिरण्यकश्यपु द्वारा लाख समझाने एवं प्रताड़ित करने के बावजूद भगवान से अलग नहीं हो रहे थे। हिरण्यकश्यपु ने प्रह्लाद को जलाने के लिए होलिका का उपयोग किया। होलिका जब प्रज्जवलित अग्नि में प्रह्लाद को लेकर बैठी, तो प्रभुकृपा से ऐसी आधी आयी चादर होलिका के शरीर से उड़कर प्रह्लाद के शरीर को ढ़क लिया। होलिका जल गयी और प्रह्लाद बच गए।

होलिका का उद्देश्य पवित्र नहीं था। इसलिए सहयोगी साधन भी विपरीत परिणाम दे दिया। भौतिक एवं अभौतिक साधनों को दूसरों के अहित में नहीं लगाना चाहिए। लक्ष्य पवित्र नहीं हो, तो वरदान भी शाप बन जाता है। अपने साधन और सामर्थ्य को समाज हित में लगाएं। दूसरे के अहित के प्रयोजन से उपर्युक्त सहयोगी साधन भी विपरीत परिणाम देने लगते हैं। न

कारात्मक विचार और कुकृत्य से समाज में व्यक्ति को यथोचित सम्मान प्राप्त नहीं होता है। इसलिए नकारात्मक भाव मन में अंकुरित भी नहीं होने दें। स्वामी जी ने कहा कि वाणी पर संयम रखना चाहिए। बिना सोचे-विचारे कुछ नहीं कहना चाहिए। इसीलिए नीति कहती है कि शास्त्रपूतं वदेत् वाचम् यानी शास्त्र के अनुकूल वाणी बोलनी चाहिए। मन से सोचकर वाणी बोलनी चाहिए। जो शिक्षा, भगवान, संत और शास्त्र के विरोधी हों, वह शिक्षा ग्राह्य नहीं है।

बोलने और देखने की शैली अच्छी नहीं हो तो जीवन निराशपूर्ण हो जाता है
जीयर स्वामी ने कहा कि गलत आहार, गलत व्यवहार एवं शास्त्र-विरूद्ध विवाह के कारण जीवन में शांति नहीं मिलती। बल्कि जीवन संकटमय हो जाता है। हमारे बोलने और देखने की शैली अच्छी नहीं हो तो जीवन निराशपूर्ण हो जाता है। कहीं भी जायें दुर्गुण और अपयश लेकर नहीं लौटें। उत्पन्न परिस्थितियों में अपने विवेक से निर्णय लें, जिससे भविष्य कलंकित न हो पाए। प्रयास हो कि वहाँ अपने संस्कार संस्कृति एवं परम्परा के अनुरूप कुछ विशिष्ट छाप छोड़कर आयें, ताकि तत्कालिक परिस्थितियों के इतिहास में आप का आंकलन विवेकशील एवं संस्कार संस्कृति संरक्षक के बतौर किया जा सके।

स्वामी जी ने कहा कि धर्मो रक्षति रक्षितः। यानी जो धर्म की रक्षा करता है, उसकी रक्षा धर्म करता है। जो धर्म की हत्या करता है, धर्म उसकी हत्या कर देता है। धर्म एव हतो हन्ति। इसलिए धर्म का परित्याग नहीं करना चाहिए।

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