पिलग्रिम हॉस्पिटल शताब्दी समारोह विशेष:गया में 1895 में हुआ था स्तन कैंसर का ऑपरेशन, घोड़े के बाल से हुई थी स्टिचिंग

गयाएक वर्ष पहले
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  • तत्कालीन सीएस आर मैक्रे ने 31 दिसंबर को किया था डिस्चार्ज
  • मरीजों को ऑपरेशन से पहले मिलते थे सूखे मेवे, दूध सहित अन्य पौष्टिक आहार

(राजीव कुमार) आज से 125 साल पहले 02 दिसंबर 1895 को गया के पिलग्रिम हॉस्पिटल में स्तन कैंसर का सफल ऑपरेशन हुआ था। यह तथ्य आश्चर्यजनक, किंतु सत्य है। गया जिले की 36 वर्षीय विमला अपने बाएं स्तन में दर्द के इलाज को एडमिट हुई। वह चार बच्चों की मां थी, सबसे छोटा बच्चा छह साल का था। 15 साल पहले, जब उसने दूसरे बच्चे को जन्म दिया, तब बाएं स्तन में गांठ का अनुभव किया। वह धीरे-धीरे बढ़ता रहा, नौ साल तक दर्द का अनुभव नहीं हुआ।
पिछले छह साल से उसमें दर्द का अनुभव हुआ व उसमें दूध रहने से अपने बच्चे को लगातार पिलाती रही। पिलग्रिम हॉस्पिटल के तत्कालीन सिविल सर्जन लेफ्टिनेंट कर्नल आर मैक्रे ने अप्रैल 1896 मेडिकल जर्नल में इस केस को प्रस्तुत करते हुए उक्त बातें लिखी। उन्होंने बताया, उक्त महिला में कैंसर से संबंधित दुर्बलता नहीं थी, बल्कि पूरी तरह स्वस्थ थी। उस हिस्से में तीन ग्लैंड से स्तन का आकार बढ़ गया था। अब वह नारियल की तरह कठोर हो गया था। संभवतः नाई द्वारा ठीक कर देने के आश्वासन पर किए गए इलाज से झिल्लीदार हो गया था।

तापमान हुआ स्थिर
02 से 06 दिसंबर तक 99.6 से 103  फाॅरेनहाइट तक तापमान रहा। 07 दिसंबर से तापमान नहीं बढ़ा। ऑपरेशन का हिस्सा जल्द सूखने लगा था। 31 दिसंबर 1895 को उसे डिस्चार्ज कर दिया। उस दिन तक ग्लैंड में किसी तरह का विकास नहीं देखा गया।
अल्सर के कारण घुटने से नीचे काटा गया था पैर
एक अन्य केस का जिक्र किया, जिसमें 16 साल के किसनुवा का घुटना से नीचे का पैर काटकर हटाना पड़ा। 16 सितंबर 1895 को वह अस्पताल आया, दाहिने पैर में बड़ा सा अल्सर था व पिंडली की हड्डी का क्षय हो रहा था। एक साल से वह इससे परेशान था। जब वह अस्पताल में दाखिल हुआ, काफी कमजोर व एनेमिक था। उसे 15 दिनों का आयरन टेबलेट के साथ पौष्टिक आहर दिया गया। आइडोफार्म व बोरिक मलहम से ड्रेसिंग की गई। उसके स्वास्थ्य में बदलाव हो रहा था, लेकिन अल्सर ठीक नहीं हो रहा था। 04 अक्टूबर को अंततः क्लोरोफार्म देकर उसके दाहिने पैर को घुटने के नीचे से काट दिया गया। लोहे व घोड़े के बाल से टांका दिया गया। घाव पर इडोफार्म व बोरिक लिंट डालकर एंटिसेप्टिक काॅटन व बेंडेज से ड्रेसिंग की गई। 10 नवंबर को डिस्चार्ज कर दिया गया।
लोहे के तार और घोड़े के बाल से की गई थी मरीज की स्टिचिंग

02 दिसंबर 1895 की सुबह मरीज को ऑपरेशन के लिए क्लोरोफॉर्म देकर, उसके बाएं स्तन को पूरी तरह काटकर हटा दिया गया। प्रेशर-फोरसेप्स पद्धति से ब्लड बहने से रोका गया व लोहे के तार व घोड़े के बाल से उसकी स्टिचिंग की गई। उसपर आइडोफाॅर्म पावडर का छिड़काव किया गया व साथ ही बोरिक लिंट से ड्रेसिंग की गई। एंटीसेप्टिक ड्रेसिंग होता रहा। स्तन के मूवमेंट को रोकने व घाव जल्द भरने को बाएं बांह को भी बांध दिया।
मिलते थे सूखे मेवे

सिविल सर्जन द्वारा दिए गए केस स्टडी से पता चलता है कि कमजोर मरीजों को ऑपरेशन से पहले पौष्टिक आहार मिलता था, जिसमें आयरन व मल्टीविटामिन टेबलेट के अलावा सूखे मेवे, चना व दूध शामिल था। इसी व्यवस्था हॉस्पिटल का प्रबंधन करता था।

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