पाएं अपने शहर की ताज़ा ख़बरें और फ्री ई-पेपर

डाउनलोड करें

आस्था:करुणा और सहिष्णुता से जाग्रत होता है सेवाभाव

बोधगया24 दिन पहले
  • कॉपी लिंक
  • बीटीएमसी के बौद्ध भिक्षु डॉ मनोज ने कहा-अष्टांगिक मार्ग के अनुसरण से लोभ, द्वेष, मोह से मुक्त होता है मानव

कोरोना काल में सबसे जरूरी है दूसरों की सेवा और मदद। सेवा का भाव हमारे अंतस से जाग्रत होता है। करूणा व सहिष्णुता से ही सेवा का भाव आता है। इसके लिए व्यक्ति के आचार-विचार व व्यवहार में बदलाव जरूरी है। भगवान बुद्ध ने भी चित्त परिवर्तन पर जोर दिया। बीटीएमसी के बौद्ध भिक्षु डा मनोज ने उक्त बातें कही। उन्होंने कहा, चित्त व मन को नियंत्रित कर ही हम बोधि की ओर अग्रसर होते हैं। हम अष्टांगिक मार्ग का अनुसरण कर खुद में बदलाव ला सकते हैं। यह मार्ग जीवन जीने का तरीका बतलाता है।

अंतस का बदलाव जरूरी
केवल बौद्धिक ज्ञान से जीवन में बदलाव नहीं होता। इसके लिए व्यक्ति के अंतस का बदलाव जरूरी है। सम्यक दृष्टि से ही हम बाह्य जगत से अंतःजगत की ओर मुड़ सकते हैं। तभी हम वस्तुओं के वास्तविक स्वरूप, उसकी अनित्यता, अनात्मता को जान सकते हैं। तृष्णा, अविद्या से छुटकारा मिलेगा। यह सम्यक दृष्टि से ही संभव है। सम्यक संकल्प बताता है कि जैसी हमारी दृष्टि होगी, वैसा ही हमारा कर्म होगा। केवल लक्ष्य की बात करने से नहीं बल्कि बदलाव का संकल्प लेना जरूरी है।

बोलने से पहले सोचे
केवल संकल्प लेने नहीं, बल्कि उसे वाणी द्वारा अभिव्यक्त भी करें। सम्यक वचन से मनोभाव को वाणी प्रकट होता है। इसलिए कुछ भी बोलने से पहले चिंतन करें क्योंकि संघर्ष और शांति इसी से होती है। वचन को संयमित होना चाहिए। सम्यक कर्म का मतलब, जो हम संकल्प लेते हैं, वाणी से अभिव्यक्त करते हैं, उसे कर्म में भी उतारना होगा। तीनों में तालमेल जरूरी है।

खबरें और भी हैं...