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धर्मपाल जयंती आज:भौतिक विकास को करुणा, क्षमा जैसे मानवीय मूल्यों से जोड़ें

गया2 दिन पहले
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  • 18 सितंबर 1893 को शिकागो धर्म सम्मेलन को साउथ थेरवादी बौद्ध का प्रतिनिधित्व करते हुए धर्मपाल ने कहा

आध्यात्मिक उपाय उपलब्ध हैं, लेकिन हमें उन्हें उस वर्ग के लिए स्वीकार्य बनाना होगा जिनमें आध्यात्मिक रुझान न हो। ये उपाय तभी व्यापक रूप से प्रभावशाली होंगे यदि हम ऐसा कर सकें। यह महत्त्वपूर्ण है क्योंकि विज्ञान, तकनीक और भौतिक विकास हमारी सारी समस्याओं का समाधान नहीं कर सकते। हमें अपने भौतिक विकास को करुणा, सहिष्णुता, क्षमा, संतोष और आत्मानुशासन जैसे मानवीय मूल्यों के आंतरिक विकास के साथ जोड़ने की आवश्यकता है। सिंहली अनागारिक धर्मपाल 29 साल की अवस्था में शिकागो में वर्ल्ड पार्लियामेंट में साउथ थेरवादी बौद्ध का प्रतिनिधित्व करते हुए 18 सितंबर को दुनिया को बौद्ध धर्म को विज्ञान से नजदीक बताते हुए उक्त बातें कही। उन्होंने सर एडविन अर्नाल्ड के हवाले कहा था कि बौद्ध धर्म आधुनिक विज्ञान पर आधारित है। उन्हें आधुनिक बौद्ध धर्म का पुनरूद्धारक माना जाता है।

कौन हैं धर्मपाल| अनागारिक धर्मपाल श्रीलंका के बौद्ध है, जिनका जन्म 17 सितंबर 1864 को हुआ था। 22 जनवरी 1891 को लाईट ऑफ एशिया पढ़ने के बाद पहली बार बोधगया पहुंच कर महाबोधि मंदिर देखा। उसकी दयनीय स्थिति देखते हुए मंदिर मुक्ति आंदोलन की शुरूआत की। 31 मई 1891 को उन्होंने महाबोधि सोसायटी की स्थापना की। सोसायटी ने कई राज्यों व अनेक देशों में अपनी शाखा खोली व बौद्ध स्थलों के संरक्षण का काम किया।

सृष्टि का कोई सृजनकर्ता नहीं
विज्ञान और बौद्ध धर्म दोनों ही इस समान निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि सृष्टि का कोई सृजनकर्ता नहीं है। विज्ञान में पदार्थ तथा ऊर्जा के संरक्षण का सिद्धान्त कहता है कि पदार्थ या भौतिक तत्व और ऊर्जा का न तो सृजन किया जा सकता है और न ही इन्हें नष्ट किया जा सकता है, ये केवल रूपान्तरित होते हैं। बौद्ध जन इससे पूरी तरह सहमत हैं और इस सिद्धान्त को चित्त के मामले में भी लागू करते हैं।

चित्त का नियंत्रण जरूरी
उन्होंने थेरवादी परंपरा पर कहा कि चित्त से ही सभी कर्मों का संपादन किया जाता है। चित्त को यदि नियंत्रित कर कुशल कर्मों की ओर प्रेरित किया जाये, तब बोधि की प्राप्ति हो सकती है। सभी कर्मों की जननी चित्त या मन है। अकुशल कर्मों के प्रभाव में चित्त स्वभावतः स्मृति, वासना, कल्पना आदि से अशुद्ध हो जाता है। इनके शोधन नहीं करने से चित्त द्वादश निदानों प्रतित्यसमुत्पाद के चक्र में पड़ जाता है।

बौद्ध विश्व के लिए महत्वपूर्ण
अपने सम्बोधन के दौरान धर्मपाल ने बौद्ध धर्म को विश्व के लिए महत्वपूर्ण बताते हुए मानवतावाद से जोड़ा। बुद्ध की शिक्षा में नैतिकता का पाठ है। शिष्य-गुरू संबंध, मनुष्य के प्रति दृष्टि, पर्यावरण संरक्षण, मालिक व नौकर के बीच संबंध के अलावा भगवान बुद्ध के उपदेशों पर विवेचना प्रस्तुत की।

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