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अच्छी पहल:सूबे में पहली बार एंटीफंगल गुणों से भरपूर काली हल्दी की खेती

टिकारीएक महीने पहलेलेखक: संजय अथर्व
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  • जिले के आशीष ने लगभग एक कट्ठे में की है काली हल्दी की रोपाई, इसके पहले की थी काला धान व काला गेहूं की खेती

प्रखंड के गुलरियाचक के प्रगतिशील किसान आशीष खेती में अपने प्रयोग के लिए विशेष पहचान रखते हैं। पूर्व में वे जिले में पहली बार काला धान और काले, नीले, बैंगनी गेहूं की खेती कर न सिर्फ जिले में बल्कि सूबे में अपनी पहचान बनाई थी। अब वे सूबे में पहली बार काली हल्दी की खेती शुरू की है।

एंटीऑक्सीडेंट व एंटी फंगल गुणों से भरपूर होती है काली हल्दी और अपने उसी गुणों के कारण यह आदिवासियों में भी लोकप्रिय है। 2016 में भारतीय कृषि विभाग ने काली हल्दी को एक लुप्तप्राय प्रजाति के रूप में सूचीबद्ध किया है।यह अपने औषधीय गुणों के लिए जाना जाता है। साथ ही किसानों को आर्थिक समृद्धि देने भी सक्षम है। आशीष ने लगभग एक कट्ठा में इसकी रोपाई की है।

प्रगतिशील किसान हैं आशीष
आशीष कुमार दांगी का पैतृक घर प्रखंड के सिमुआरा पंचायत के गुलारियाचक गांव में है। क्षेत्र में राजनीतिक सक्रियता के कारण इनका परिवार काफी लोकप्रिय है। इनके घर से अभी तक दो दो विधायक और मुखिया रह चुके हैं परन्तु आशीष का मन राजनीति में नहीं रमकर पढ़ाई और कृषि में लगा। इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी करने के बाद आशीष छत्तीसगढ़ के डोंगरगढ़ इंजीनियरिंग कालेज में वाइस प्रिंसिपल थे। बाद में वे नौकरी छोड़कर घर लौटे और 2016 से लगातार खेती को लाभदायक बनाने के लिए प्रयोग करने में लगे हैं।

काली हल्दी के औषधीय उपयोग: इंटरनेशनल जनरल ऑफ रिसर्च इन फार्मेसी एंड केमिस्ट्री में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार काली हल्दी का उपयोग करने से पेट दर्द, गैस्ट्रिक, तनाव से राहत पाने में काफी मदद मिलती है। काली हल्दी एंटी ऑक्सीडेंट और एंटीफंगल गुणों के लिए जाना जाता है। यह शरीर में सूजन के साथ-साथ संक्रमण को दूर रखता है।

काला धान व गेहूं की भी करते हैं खेती
किसान आशीष जी खेती में प्रयोग करने के लिए जाने जाते हैं और साथ ही अन्य किसानों को भी प्रोत्साहित करते हैं। वे काला चावल, काला गेहूं, नीला गेहूं और बैंगनी गेहूं की खेती कर रहे हैं और अन्य किसानों को भी इसके बीज और जानकारी भी दे रहे हैं। उनका कहना है कि काला चावल व काला गेहूं, नीला गेहूं का उत्पादन बहुत ही अच्छा हो रहा है।

क्या है काली हल्दी
लोग काली हल्दी के बारे में नहीं जानते हैं। परन्तु यह आमतौर से भारत के पूर्वोत्तर के साथ-साथ मध्यप्रदेश में उगाया जाता ह । इसका मूल उपज स्थान पूर्वोत्तर और छतीसगढ़ रहा है। आदिवासियों के बीच यह पुष्टिकारक औषधि के रूप में पीढ़ियों से जाना जाता रहा है। काली हल्दी का वैज्ञानिक नाम कुरकुमा कैसिया है। पीली हल्दी की तरह ही इसका उपयोग किया जाता है। मध्यप्रदेश के कई आदिवासी समुदाय द्वारा काली हल्दी का उपयोग किया जाता है। जड़ी बूटी के रूप में भारत और दक्षिण पूर्व एशिया के बाजारों में ताजा या सूखाकर बेचा जाता है।

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