कोरोना के कारण अंतरराष्ट्रीय फ्लाइट नहीं चली:अब महाबोधि मंदिर में चीवर की कमी से भगवान बुद्ध को चढ़ाया जा रहा कपड़ा

गया23 दिन पहले
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महाबोधि मंदिर में भगवान बुद्ध के वस्त्र चीवर की कमी हो गई है। चीवर विदेशों से आए श्रद्धालु लाते हैं और भगवान बुद्ध को चढ़ाते हैं। बाद में बीटीएमसी उसका फिर से इस्तेमाल करता है। कोरोना के कारण इंटरनेशनल फ्लाइट पर रोक के कारण श्रद्धालु के अलावा पवित्र चीवर नहीं आ पा रहा है। बीटीएमसी कार्यालय ने बताया, इस कारण भगवान बुद्ध को भी चीवर के स्थान पर तीन-तीन मीटर के तीन कपड़े चढ़ाए जा रहे हैं। यही नहीं बोधगया मंदिर प्रबंधकारिणी समिति (बीटीएमसी) वर्षावास के बाद बौद्ध भिक्षुओं को समारोह पूर्वक चीवर प्रदान करता है।

31 अक्टूबर 2021 को बीटीएमसी ने चीवरदान समारोह का आयोजन किया, जिसमें मुश्किल से 10 बौद्ध भिक्षुओं को चीवर मिला। 2019 तक 300 से 500 भिक्षुओं के बीच चीवर का दान होता था। बौद्ध भिक्षुओं का वस्त्र चीवर कहलाता है व उसे थाईलैंड, म्यांमार व श्रीलंका के श्रद्धालु लाते हैं। बीटीएमसी कार्यालय ने कहा, कोरोना से पहले चीवर का दान किसी विदेशी उपासक या उपासिका की ओर से होता था, लेकिन लॉक डाउन के कारण पिछले दो साल से विदेशी उपासक या श्रद्धालु के नहीं आने से चीवर की कमी हो गई है।

भिक्षु का वस्त्र है चीवर

बौद्ध भिक्षु का काषाय वस्त्र, जो कई टुकड़ों के साथ जोड़कर बनाया जाता है, चीवर कहलाता है। विनय पिटक के अनुसार भिक्षु को तीन चीवर धारण करने का विधान है। भारत में नागपुर में चीवर बनते हैं। भगवान बुद्ध ने पांसुकूलिक अर्थात चीथड़ों को जोड़कर चीवर बनाने की परंपरा बनाई थी, किंतु ज्ञान प्राप्ति के 20 साल बाद यानि 2590 साल पहले उपासकों से चीवर लेने की अनुमति दी थी। बौद्ध गृहस्थों व श्रद्धालुओं को उपासक या उपासिका कहते हैं।

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