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पुण्य का काम:दलाई लामा ट्रस्ट को 30 एकड़ जमीन मिली दान

बोधगया2 महीने पहले
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  • दोमुहान-डोभी एनएच-83 पर प्रस्तावित मैत्रेय प्रोजेक्ट के अब शुरू होने की है संभावना

दोमुहान-डोभी एनएच 83 पर प्रस्तावित मैत्रेय प्रोजेक्ट के अब शुरू होने की संभावना नहीं है। दलाई लामा से जुड़े बोधगया तिब्बती मंदिर के प्रभारी अमजी लामा के अनुसार, प्रोजेक्ट से जुड़े अधिकारियों ने धर्मशाला में दलाई लामा से भेंट कर प्रोजेक्ट की 30 एकड़ जमीन दलाई लामा ट्रस्ट को दान करने का प्रस्ताव दिया है। दलाई लामा ने इसकी स्वीकृति दे दी है। बहुचर्चित मैत्रेय प्रोजेक्ट भूमि उपलब्ध कराने में विफल रही तत्कालीन सरकार से नाराज होकर 2001 में बोधगया को छोड़कर कुशीनगर शिफ्ट कर दिया गया था। लेकिन 2012 में कुशीनगर के अलावे बोधगया में काम शुरू करने का निर्णय लिया गया था। इस परियोजना के तहत बोधगया दोमुहान के निकट मैत्रेय की विशालकाय मूर्ति के अलावे शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, आधारभूत संरचना, पर्यावरण व पर्यटन के विकास पर काम होना था। प्रोजेक्ट पर 150 मिलियन अमेरिकी डाॅलर के खर्च होने की संभावना थी।

दान का मिला है प्रस्ताव
मैत्रेय प्रोजेक्ट ने दोमुहान के निकट की 30 एकड़ जमीन दान में देने का प्रस्ताव किया है। दलाई लामा ट्रस्ट इसपर मंदिर के अलावा दलाई लामा के सलाना टीचिंग के लिए आधारभूत सुविधा उपलब्ध कराएगी।
अमजी लामा, तिब्बत मंदिर, बोधगया

प्रवचन के लिए अब बनेगा हाॅल
इस जमीन पर दलाई लामा के सलाना प्रवचन के लिए टीचिंग हाॅल सहित अन्य आधारभूत सुविधा उपलब्ध कराई जाएगी। अगर कालचक्र पूजा हुई, तब इसी जगह पर आयोजन व अनुष्ठान होगी। वर्तमान में महाबोधि मंदिर के निकट कालचक्र मैदान पर इसका आयोजन होता है, जहां महाबोधि मंदिर की सुरक्षा को लेकर श्रद्धालुओं को परेशानी होती है। दलाई लामा का आवासन स्थल व मंदिर भी यहां बन सकता है। एकीकृत क्षेत्र के रूप में दलाई लामा ट्रस्ट इसे विकसित करेगा।

क्या है मैत्रेय प्रोजेक्ट
बोधगया में 500 फुट ऊंची मैत्रेय की मूर्ति की स्थापना प्रस्तावित थी। लेकिन बाद में एयरपोर्ट को ध्यान में रखते हुए 150 फुट ऊंची मैत्रेय की मूर्ति की स्वीकृति मिली। बौद्ध परंपरा में मैत्रेय को भावी बुद्ध माना जाता है। इनका अवतरण भगवान बुद्ध के परिनिर्वाण के पांच हजार साल बाद भारत में होना है। प्रोजेक्ट के तहत ताइवान में कांस्य की बनने वाली मूर्ति पर लाखों की संख्या में मंत्र व सूत्र उत्कीर्ण होना था। मूर्ति का आसन अपने आप में एक भव्य मंदिर होता, जिस पर स्वर्ण व अन्य कीमती रत्नों से सूत्र लिखे होतें। डिजाइनर लंदन के ऐशले बतेसन हैं।

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