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आजादी का अमृत महोत्सव-08:गया के बाढ़ो थे पहले शहीद, वजीरगंज के खुशियाल सिंह से घबराएं अंग्रेज

गया16 दिन पहलेलेखक: राजीव कुमार
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बात 04 जून 1857 की है। स्वतंत्रता के लिए अंग्रेजों व उनकी शासन को परेशान करने में क्रांतिकारी लगे थे। बनारस में अंग्रेजों के विरूद्ध विद्रोह हो चुका था व उसकी लपटें गया तक पहुंच चुकी थी। यहां भी विद्रोह की संभावना बनने लगी। गया से सटे जीटी रोड से होकर अन्य क्षेत्रों में सैनिकों की आवाजाही होती थी। इस कारण गया पर अंग्रेजों का कब्जा बरकरार रखना जरूरी था।

उस दौरान गया में यूरोपियन सैनिक तैनात नहीं थे। गया की सुरक्षा के लिए अंग्रेजी सेना की मांग को लेकर गया के तत्कालीन मजिस्ट्रेट अर्लोजी मनी ने कोलकाता टेलिग्राम किया। शेरघाटी से होकर 64वीं रेजिमेंट जा रही थी। उस रेजिमेंट के 120 सिख सैनिकों को गया की सुरक्षा के लिए भेज दिया गया। स्थानीय लोग उन सैनिकों का बहिष्कार किया और अछूत मानते हुए साथ बैठने से भी इंकार किया।

इसी बीच विष्णुपद मंदिर के निकट सिख सैनिकों ने बाढ़ो नामक एक व्यक्ति की दुकान से कुछ खाद्य सामग्री उठा ली। उसे लगा कि सैनिकों ने सामान में गाय व सुअर की चर्बी मिला दिया। इसपर झंझट हुआ और बाद में अंग्रेजी सेना का हिस्सा रहे उन सिख सैनिकों ने उसे गिरफ्तार कर फांसी दे दिया। इस घटना का काफी विरोध हुआ, जिसके बाद विद्रोह के डर से उन सैनिकों को 10 जुलाई 1857 को गया से रवाना कर दिया गया। दरअसल, अंग्रेजों के कारतूस पर इन दोनों जानवरों की चर्बी लगने की शंका पर ही ईस्ट इंडिया कंपनी की पैदल सेना का सिपाही मंगल पांडे ने विद्रोह किया था, जो 1857 की क्रांति का तात्कालिक कारण भी था।

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