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आस्था:कंबोडिया और इंडोनेशिया में भी है भगवान विष्णु के पदचिह्न की महिमा

गया4 दिन पहलेलेखक: राजीव कुमार
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गया का विष्णुपद चिह्न - Dainik Bhaskar
गया का विष्णुपद चिह्न
  • गया के अलावा देश के कई हिस्सों में है विष्णु की पदरूप में पूजा की परंपरा, दक्षिण भारतीय कई राजाओं के अभिलेखों में है पदमूल के रूप में उल्लेख

गया के अलावा देश व विदेश में भी विष्णु की पद के रूप में पूजा की परंपरा है। ईसा के प्रारंभ में और खासकर गुप्त काल में दक्षिण पूर्व एशिया के कुछ देशों में पद के रूप में भगवान विष्णु की अराधना के प्रमाण मिलते हैं।

स्थापितम भगवतो भुवी पदमूलम, कंबुज अर्थात कंबोडिया के राजा गुणवर्मन की पांचवीं शताब्दी ई. के एक शिलालेख में उक्त बातें उत्कीर्ण है। इसमें पदमूल ;पदचिन्हद्ध का उल्लेख भगवान चक्रतीर्थस्वामी अर्थात हरि, नारायण और माधव यानी विष्णु के रूप में किया गया है।

इन्हीं के द्वारा विष्णु की मूर्ति की स्थापना व दान का उल्लेख है। उन्हें स्वामिन भी कहा गया है। एक अन्य अभिलेख में गुणवर्मन द्वारा चक्रतीर्थ स्वामिन विष्णु के पदचिह्नों की स्थापना का उल्लेख है। जावा के सी-अरूतम से, अब वर्तमान इंडोनेशिया का हिस्सा है, एक पांचवी सदी का राजा पूर्णवर्मन का शंख लिपि में शिलालेख मिला है।

अभिलेख में विष्णोर पद द्रव्यम उत्कीर्ण है, जिसके आधार पर इतिहासकार डा वोगेल ने राजा के पैरों की तुलना विष्णु के पैरों से की है। उस उत्कीर्ण पैर की उंगलियों पर कमल के निशान हैं और विष्णुपुराण के अनुसार भागवत के चरणों पर ध्वज, अब्ज अर्थात कमल, वज्र, अंकुस व यव अर्थात जौ की बाली चिह्नित किया गया है, जो भगवान विष्णु के प्रतीक हैं।

इसके अलावा अभिलेख का उत्कीर्ण श्राद्ध के मौके पर स्मृति के रूप में करवाने की बात कही गई है। गया में श्राद्ध के लिए विष्णुपद क्षेत्र में तर्पण व पिंडदान के अलावा पूर्वजों की याद अक्षुण्ण रखने को कुछ निर्माण की परंपरा रही है।

महाभारत में छह जगह है विष्णुपद का उल्लेख
महाभारत में कम से कम छह जगहों पर विष्णु के पद चिह्नों की पूजा की जानकारी दी गई है। महाभारत के तीसरे, पांचवें, आठवें, 12वें व 13वें अध्याय में उत्तर की पहाड़ी की चोटी पर विष्णु पद चिह्न का उल्लेख है। रामायण के वर्णन के आधार पर इतिहासकार डीसी सरकार ने वह्लिक में विष्णुपद का बताया है, जो वस्तुतः विपासा नदी के तट पर बसे वहिका होना चाहिए था।

मेहरौली अभिलेख में भी वर्णन
गुप्त सम्राट चंद्र के मेहरौली अभिलेख में विष्णुपद गिरि पर विष्णु ध्वज लगाने का उल्लेख है। उसे कुछ इतिहासकार गया के विष्णुपद से मिलाते हैं, तो डीसी सरकार ने व्यास और कुरूक्षेत्र के बीच मानी है। फ्लीट ने उसे मेहरौली ही माना है, जबकि वीए स्मिथ ने मथुरा के निकट एक पहाड़ी को माना है।

दक्षिण भारतीय अभिलेखों में वर्णन
1055 ई का कदंब शासक हरिकेश व वाकाटक सोमेश्वर प्रथम के काल का बंकापुर अभिलेख में नारायण राजा द्वारा महापुरूष अर्थात विष्णु के पदमूल की देखरेख को जमीन दान का उल्लेख है। आंध्र प्रदेश के चित्तूर जिले के नागरी में 423 ई का मिले अभिलेख में तीन भाइयों द्वारा भगवान विष्णु के पदचिह्नों पर एक मंदिर बनाने का उल्लेख है। पांचवीं सदी के कोरापुट जिले के पोदागढ़ से मिले अभिलेख में नाल राजा स्कंदवर्मन द्वारा विष्णु का पदमूल बनाने का वर्णन है।

चिह्न अभिलेख में रामगिरिस्वामी पदमूल स्थापित करने का है वर्णन
वाकाटक रानी प्रभावती गुप्त के रिद्धपुर ताम्रपत्र अभिलेख में रामगिरिस्वामी पदमूल स्थापित करने का वर्णन है। प्रभावती गुप्त के ही एक अन्य पूना अभिलेख में भागवतपदमूले निवेद्य उल्लिखित है, जो विष्णु के पदचिह्न को प्रतिबिंबित करता है।

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