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  • Three Rosa Were Kept Every Month Before 623 AD; Five Things For Muslims Are Duty, Rosa Is One Of Them

माह-ए-रमजान:सन् 623 ई. से पहले हर महीने रखा जाता था तीन रोजा; मुसलमानों के लिए पांच चीजें हैं फर्ज, रोजा उसमें से है एक

गया4 महीने पहले
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  • रमजान के तीसरे अशरे की हुई शुरुआत, जहन्नुम से निजात के लिए मांगी जाएंगी दुआएं
  • रमजान के महीने में ही आसमां से फरिश्ते कुरअान की आयतें लेकर धरती पर उतरे

(दीपक कुमार) रहमत, इबादत व बरकत का खास महीना “रमजान’। माह-ए-रमजान में हर मुसलमानों को रोजा रखना फर्ज हैं। रोजा रखने से बुराई कम और नेकी करने की क्षमता बढ़ती है। रमजान का तीसरा अशरा शुक्रवार से शुरू हो चुका है। कहा जाता है कि इस अशरे में इबादत करने से जहन्नुम से निजात मिलती है और रोजेदारों को जन्नत नसीब होती है। बता दें कि पूरे रमजान को तीन हिस्सों में बांटा गया है। जो पहला, दूसरा और तीसरा अशरा कहलाता है। अशरा अरबी का दस नंबर होता है। जिसमें पहला अशरा रहमत का होता है, दूसरा अशरा मगफिरत यानी गुनाहों की माफी का होता है और तीसरा अशरा जहन्नुम की आग से खुद को बचाने का होता है।
रमजान में रोजा रखना होता है फर्ज
इस्लाम धर्म के आखिरी नवीं पैंगबर हजरत मोहम्मद साहब ने रमजान में रोजा फर्ज होने से पूर्व और फर्ज होने के बाद रखा। फर्ज होने के बाद नौ साल तक उन्होंने रोजा रखा। करीब सन् 623 ई. से पूर्व हर माह की 13 वीं, 14 वीं और 15 वीं तारीख को रोजा रखा जाता था, साथ ही मुहर्रम माह के 10 वीं तारीख “यौमे आशुरा’ को रोजा रखना फर्ज था। इसके बाद सन् दो हिजरी में शाबान के महीने में अल्लाह का हूक्म आया रमजान में हर मुसलमानों को रोजा रखना फर्ज है। कुरान-ए-शरीफ के सुरत नं. दो आयात नं. 183 से 187 में इसका जिक्र है। खानकांह के सज्जादानशीह सह इस्लामिक स्कॉलर सैयद शाह सबाहउद्दीन चिश्ती मोनमी ने बताया कि आज भी कुछ मुसलमान हर महीने तीन रोजा रखते है। यह रोजा फर्ज नहीं नफील हैं। यानि रखा तो सबाब मिलेगा, नहीं रखा तो कोई गुनाह नहीं। पर माह-ए-रमजान में रोजा रखना फर्ज हैं। 
23 साल तक धरती पर उतरीं कुरान की आयतें: इस्लामिक स्कॉलर ने बताया कि माह-ए-रमजान इस्लाम के लिए खास हैं। इसी दिन आसमां से फरिश्ते कुरान की आयतें लेकर धरती पर उतरे। इसके बाद 23 साल तक कुरान की आयतें धरती पर उतरी। पवित्र ग्रंथ कुरान में 30 पारा, 114 सुरा और 6236 आयते हैं। उन्होंने बताया कि फरिश्ता हज़रत जिब्राईल छोटी-छोटी आयतें लेकर धरती पर आते थे। उन्होंने बताया कि इस्लाम धर्म की नींव कुरान-ए-शरीफ हैं। 
रोजा उर्दू और फारसी शब्द, अरबी में ‘सौम’: खानकांह के नाजिम शाह अता फैसल ने बताया कि उर्दू व फारसी में रोजा लिखा जाता है। अरबी में सौम कहते है। कुरान शरीफ में रोजा के जगह सौम का ही प्रयोग किया गया हैं। खानकांह के नाजिम शाह अता फैसल ने बताया कि एक लाख 24 हजार नवीं और रसूल धरती पर उतरे। इस्लाम धर्म का प्रचार-प्रसार किया। अल्लाह के संदेशों को घर-घर पहुंचाया।
मुसलमानों के लिए पांच चीजें हैं फर्ज: मुसलमानों के लिए पांच चीजें फर्ज हैं। एक कलमा, दूसरा नमाज, तीसरा रमजान का रोजा, चौथा जकात और पांचवां हज। कुरान-ए-शरीफ में कहा गया है कि रोजा रखने से बुराई कम और नेकी करने की क्षमता बढ़ती है। रोजे के लिए गिनती के दिन है। एक महीना तक इसे रखना फर्ज है। अगर इस बीच कोई बीमार या सफर में है तो वह रोजा छोड़ सकता है, लेकिन उतने रोजे रमजान के बाद किसी भी दिन रखने होंगे।

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