जागरूकता:कुपोषित बच्चों में टीबी की संभावना अधिक, इसलिए इनकी पहचान जरूरी

भभुआ13 दिन पहले
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  • बच्चों में वयस्कों की तुलना में रोग प्रतिरोधक क्षमता काफी कम होती है

गंभीर रूप से कुपोषित बच्चों में टीबी की स्क्रीनिंग की जाएगी। इसको लेकर केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के संयुक्त सचिव पी. अशोक बाबू ने पत्र जारी कर आवश्यक दिशा-निर्देश दिया है। टीबी मुक्त भारत पहल के मद्देनजर, दैनिक अभिव्यक्ति और पारिवारिक इतिहास के आधार पर, सभी एनआरसी में भर्ती कुपोषित बच्चों को टीबी के लिए स्क्रीनिंग करना महत्वपूर्ण है। 2025 तक टीबी उन्मूलन लक्ष्य को प्राप्त करने की कुंजी है, इसलिए स्वास्थ्य संस्थानों, विशेष रूप से उच्च टीबी की घटनाओं वाले जिलों में अति-गंभीर कुपोषित (एसएएम) बच्चों में टीबी की जांच सुनिश्चित करें।सिविल सर्जन ने बताया कि टीबी एक संक्रामक रोग है। जो संक्रमित व्यक्ति के खांसने या छींकने से फैलती है। कुपोषित बच्चे भी टीबी के शिकार हो जाते हैं। स्वस्थ बच्चे जब टीबी संक्रमित व्यक्ति के संपर्क में आते हैं तो वह भी बीमार हो जाते हैं। यदि बच्चे को दो हफ्ते या उससे ज्यादा समय से लगातार खांसी हो रही हो तो जांच कराना आवश्यक है। उन्होंने कहा 12 साल से कम उम्र के बच्चों में बलगम नहीं बनता है। इस कारण बच्चों में टीबी का पता लगाना मुश्किल होता है।

टीबी के लक्षणों की अनदेखी न करें
सिविल सर्जन डॉ. मीना कुमारी ने कहा ‘बच्चों में टीबी के लक्षण जान पाना और उसका इलाज कर पाना एक चुनौतीपूर्ण कार्य है। क्योंकि बच्चों में वयस्कों की तुलना में रोग प्रतिरोधक क्षमता काफी कम होती है। बच्चों का अपनी उम्र के हिसाब से ऊँचाई का कम बढ़ना या वजन में कमी होना टीबी के लक्षण हो सकते हैं। अगर बच्चों में भूख, वजन में कमी, दो सप्ताह से अधिक खांसी, बुखार और रात के समय पसीना आने जैसी समस्या हो रही है, तो इसकी अनदेखी न करें। ये टीबी के लक्षण हो सकते हैं।

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