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नवरात्र विशेष:लोहा सिंह की हवेली पर है भंगहा माई स्थान, अंग्रेज अधिकारी से सतीत्व की रक्षा के लिए जमींदोज हो गई थी जमींदार की कन्या

बेतिया4 दिन पहले
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भंगहा माई स्थान।
  • बेतिया-मैनाटांड़ रोड में जिला मुख्यालय से 11 किलोमीटर उत्तर में स्थित भंगहा माई स्थान

(कृष्णकांत मिश्र) बेतिया-मैनाटांड़ रोड में जिला मुख्यालय से 11 किलोमीटर उत्तर में स्थित भंगहा माई स्थान का इतिहास अद्भुत है। भंगहा का इतिहास 17 वीं व 18 वीं शताब्दी से जुड़ा है। करीब 27 सालों से यहां कमिटी भी काम कर रही है। मंदिर के पुजारी अरविंद कुमार दूबे ने बताया कि कमिटी के माध्यम से अब यहां धर्मशाला, मंदिर का भव्य रूप और सभा स्थल का भी निर्माण करा दिया गया है।

उन्होंने बताया कि यहां शारदीय व चैत्र नवरात्र में भारी मेला लगता है। जहां भारत के विभिन्न प्रांतों के अलावे नेपाल से हजारों लाखों श्रद्धालु माता का दर्शन करने आते है। पुजारी ने बताया कि इस साल कोरोना गाइड लाइन के तहत सोशल डिस्टेंस के साथ पूजा हो रहा है। लेकिन अन्य सालों की अपेक्षा श्रद्धालु नहीं पहुंच रहे है।

लोहा सिंह के नाम पर है लाहियरिया पंचायत

लोगों की माने तो 17वीं व 18वीं शताब्दी के मध्य यहां लोहा सिंह नामक एक बड़े जमींदार हुआ करते थे। जिनकी कन्या काफी रूपवती थी। लोहा सिंह के नाम पर ही लाहियरिया पंचायत का नाम पड़ा है। स्थानीय कोठी के अंग्रेज की नीयत उस कन्या पर खराब हो गई।

एक दिन जब लोहा सिंह कही बाहर गए तो अंग्रेज अधिकारी उनके घर पहुंच गया और कन्या से अपनी हवस मिटानी चाही। लेकिन धर्म चारिणी कन्या भागकर आंगन में पहुंची और सूर्यदेव का आह्वान कर अपने सतीत्व की रक्षा के लिए खुद को जमींदोज कर लिया।

नेमी दूबे को आया था स्वप्न

ग्रामीणों ने बताया कि करीब डेढ़ सौ साल पहले भंगहा गांव निवासी नेमी दूबे को एक स्वप्न आया। वे पढ़ने में काफी कमजोर थे। माता ने स्वप्न में चार कुंओं के बीच अवस्थित नीम व सिंहोरा के पेड़ों के बीच स्थित पिंडी पर पूजा करने की बात बतायी। जिसके बाद सुबह से जाकर उन्होंनें वहां पूजा करनी शुरू कर दी। तब से गांव के लोग वहां पूजा करने लगे।

आज भी नेमी दूबे के वंशज मंदिर में पुजारी है। बताया जाता है कि जब वहां पूजा व श्रद्धालु एकत्रित होने शुरू हो गए तो कुड़िया कोठी के अंग्रेज मैनेजर हाल्टन ने 1912 में पहली बार वहां के मेले का डाक 12 रुपए में किया। जिसके बाद से ही वहां के मेले के लिए डाक की परंपरा आंरभ हुई। इसके बाद लोगों की नजर वहां पड़ी और 1993 में एक मंदिर विकास समिति बनाकर वहां का विकास आरंभ किया गया।

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