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तीन वर्ष में तीन खेसरा में हुई जमीन चिह्नित:रेल परियोजना से विस्थापित लोगों के विस्थापन में खेल

बेतिया13 दिन पहले
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जमीन आवंटन के लिए बैठक करते तत्कालीन सीओ व अन्य। - Dainik Bhaskar
जमीन आवंटन के लिए बैठक करते तत्कालीन सीओ व अन्य।
  • रेल अधिकारियों ने 52 परिवारों की सूची अंचल को सौंप कर जल्द विस्थापन करने की मांग की

छितौनी- तमकुही रेल परियोजना से विस्थापित होने वाले श्रीपतनगर गांव के 64 परिवारों को जमीन उपलब्ध कराने में प्रशासन को तीन वर्ष से भी अधिक समय लग गए फिर भी उन लोगों को समय से जमीन उपलब्ध नहीं कराई जा सकी कि वे लोग घर बना कर आराम से रह सके। इस विस्थापन की प्रक्रिया में खेल भी खूब हुए हैं। किसानों को अपनी जमीन बच जाए इसके लिए बार-बार चिन्हित की गई जमीनों को परिवर्तित भी कर दिया गया है। वहीं इसके एवज में जिस किसान की जमीन बच गई है या बचा दी गई है उसके एवज में उस किसान से अवैध रूप में मोटी रकम भी वसूली हुई है। इस तरह विस्थापन के खेल के कारण ही इतने समय भी लग गए और लोगों को समय से जमीन भी उपलब्ध नहीं हो पाई।

छितौनी-, तमकुही रेल परियोजना के दूसरे फेज का कार्य 2016 मे शुरू हुआ था। इसके लिए छितौनी से आगे रेल बांध का निर्माण कार्य शुरू हुआ। निर्माण के दौरान चिन्हित रेल लाइन के जद में 52 परिवार आ रहे थे, जो स्थाई रूप से रेल बांध की जमीन में घर बना कर निवास करते थे। इसको देख रेल अधिकारियों ने 52 परिवारों की सूची अंचल को सौंप कर जल्द विस्थापन करने की मांग की। तत्कालीन सीओ श्रीभास्कर ने जब स्थल निरीक्षण किया तो 12 परिवार ऐसे मिले जो बांध के पूरब दिशा में बसे हुए थे। इन लोगों का विस्थापन भी जरूरी था। कारण की बाढ़ उन्हें हर पल सताती। यह देख कुल 64 परिवारों के विस्थापन की प्रक्रिया शुरू हुई।
मुख्य सड़क से हट कर दी गई जमीन | पूर्व में चिन्हित जमीन पर कब्जा अंचल कर्मियों ने नही दिलाया। कारण की वे भी चाहते थे कि लोग यहां न बसे। कारण की उन जमीन पर कब्जा जमाए दबंगों से अंचलकर्मियो की साठगांठ जो हो गई थी। नतीजन लोगों को नया टोला भैसाहिया से दक्षिण दिशा में सरेह में लोगों के लिए चिन्हित किया गया। वह भी ऐसे समय मे की लोग घर भी नही बना पाए। पूर्व जिला पार्षद सुदर्शन निषाद ने बताया कि श्रीपतनगर व नया टोला भैसाहिया के अगल बगल अधिकांश जमीन खाता नंबर 2 किस्म की है। लेकिन उन्ही लोगों की जमीन लोगों में आवंटित की गई जो अंचल कर्मियों से साठगांठ नही कर पाए। उन्होंने बताया कि इस विस्थापन की प्रक्रिया में खेल के कारण ही लोगों को समय से जमीन उपलब्ध नही हो पाया।

1981 में 8 परिवारों को जमीन भी मिली थी
रेल परियोजना से विस्थापित होने वाले परिवारों को बसाने के लिए तत्कालीन सीओ ने तीन खेसरा में जमीन चिन्हित किया था। इसमें से खेसरा नंबर 1981 में आठ परिवारों को जमीन भी उपलब्ध करा दी गई थी। वही 16 परिवारों को खेसरा नंबर 2147 में जमीन चिन्हित करके घर बनाने के लिए दे दिया गया था। वही शेष लोगों के लिए 2522 खेसरा में जमीन चिन्हित करने की प्रक्रिया चल रही थी कि सीओ का हस्तांतरण हो गया। सीओ के हस्तांतरण होने के बाद तीन वर्ष लग गए लोगों को बसाने के लिए जमीन चिन्हित करने में।

इस दौरान पूर्व में चिन्हित जमीन को भी बदला गया। चिन्हित किये जमीन पर घर बनाने के लिए अपने झोपड़ी के साथ पहुंचे लोग इंतजार करते रहे लेकिन दबंगों ने जमीन नहीं छोड़ा। पीड़ितों के घर वहीं सड़ गए लेकिन जमीन नहीं मिली। इसी का फायदा उठा कुछ बिचौलियों ने उन किसानों से संपर्क किया जिनके खेत घर बनाने के लिए चिन्हित थे। फिर क्या हुआ, खेसरा में परिवर्तन कर लोगों को दूसरी जगह जमीन दिया गया और जिनकी जमीन बचाई गई उनसे मोटी रकम की वसूली भी हुई।

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