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काव्य गोष्ठी का आयाेजन:कातिल हूं फिर भी हुकूमत की जान हूं... पर हुआ वाह-वाह

बेतिया7 दिन पहले
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  • बसंत की दस्तक के बीच जुटे शहर के कवि-साहित्यकार, माहौल बना खुशनुमा

शिशिर ऋतु की विदाई व बसंत की दस्तक के बीच शहर में कवि गोष्ठियों की शुरुआत हो चुकी है। कहते हैं जिंदगी की जरूरतों को पूरा करने की जद्दोजहद से थके हुए व्यक्ति को मानसिक सुकून देने वाली कोई चीज़ है तो वह है कविता, शायरी व साहित्य। शायद इसी मर्म को समझते हुए शहर के कवियों, शायरों व साहित्यकारों की जमात एक बार फिर इकट्ठी हुई। मौका था जनवादी लेखक संघ के उपाध्यक्ष मुजीबुल हक के आवास पर आयोजित काव्य संध्या का। जिसमें शहर के नामचीन कवियों व शायरों ने शब्दों की पंचायत लगा माहौल को हल्का करने का प्रयास किया। काव्य संध्या में पहली प्रस्तुति देते हुए अरुण गोपाल ने कहा कहें कैसे उजाले हो रहे है, ये दिन तो और काले हो रहे हैं। ज्ञानेश्वर गुंजन ने अपनी भोजपुरी रचना पढ़ते हुए कहा छटा यूं बिखेरी- आइल बसन्त बगिया कुहूके कोइलिया नेहिया निभाव पिया आव लेके डोलिया।

झुलसती धूप बढ़ती जा रही है, मेरी मिट्टी झुलसती जा रही है

वहीं अख्तर हुसैन ने सुनाया झुलसती धूप बढ़ती जा रही है, मेरी मिट्टी झुलसती जा रही है। काव्य संध्या में रोटी की आत्मकथा सुनाते हुए चन्द्रिका राम ने कहा मैं रोटी हूं असल में गेहूं हूं, मिट्टी में जन्म हुआ पालन पोषण धरती मां की गोद में हुआ।

कभी खामोश रहती है, कभी इजहार करती है, बड़े मासूम लहजे में सियासत वार करती है

काव्य गोष्ठी में अपनी रचना व अनुभव बयां करते हुए कवि सुरेश गुप्त ने पढ़ा कभी खामोश रहती है कभी इजहार करती है, बड़े मासूम लहजे में सियासत वार करती है। इस दौरान जाकिर हुसैन जाकिर का बयान था मैं इस सदी का एक अनोखा जवान हूं, कातिल हूं मगर फिर भी हुकूमत की जान हूं। वहीं क़मरुज़्ज़मा कमर के अल्फाज थे जो अपनी माँ की नम आंखों से नमदीदा नहीं होता,वो बदकिस्मत है जन्नत का ख़ज़ाना छोड़ देता है। काव्य संध्या का संचालन कर रहे अनिल अनल ने प्रश्न किया बन्द राहों ये न पूछो मैं किधर जाऊंगा बन के खुशबू इन हवाओं में बिखर जाऊंगा। वहीं जफर इमाम का चिंतन था मेरा अहसास होगा तो मुझी में जो मेरा है कहीं जाता नहीं है। हास्य व्यंग्य की बानगी क्रैक बेतियाबी ने दी।

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