चंपारण सत्याग्रह का यहीं से हुआ था शंखनाद:हजारीमल धर्मशाला यदि धरोहर घोषित हो तो पर्यटन क्षेत्र में बढ़ेगा रोजगार

बेतिया2 महीने पहले
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  • धर्मशाला में गांधी जी को ठहराने से हजारीमल के इनकार करने पर उनके भाई सूरजमल ने की थी अगुआई भीड़ की वजह से स्टेशन तक नहीं पहुंच पाई थी ट्रेन, गांधी को स्टेशन से बाहर रेलट्रैक पर ही उतार लिया था

इतिहास में जब भी देश के आजादी का अध्याय पलटा जाएगा, उसमें पहले पन्ने पर ही चंपारण और यहां का योगदान स्वर्णिम अक्षरों में लिखा मिलेगा। इसी माटी ने गांधी को बापू, बैरिस्टर को महात्मा बना दिया। सत्याग्रह आंदोलन से लेकर आजादी की लड़ाई तक पग-पग पर चंपारण की माटी व यहां के रणबांकुरों का योगदान रहा है। उस समय यहां के लोग गांधी को भगवान की तरह मानते थे। गांधी जहां-जहां गए, वह जगह तीर्थ बन गया। लेकिन, देश आजाद होने के बाद गांधी व उससे जुड़े इतिहास को सहेजने का समुचित प्रयास किसी स्तर पर नहीं किया जा सका। जिसका दुख यहां के लोगों को आज भी है।

गांधी के साथ भीड़ देख डर गया था अंग्रेज एसडीओ

वैसे तो गांधी 18 अप्रैल को ही चंपारण की भूमि मोतिहारी आ गए थे। वहां से चंद्रहिया आदि का भ्रमण किया था। लेकिन 22 अप्रैल 1917 को गांधीजी, आचार्य जेबी कृपलानी, डॉ. राजेंद्र प्रसाद व अन्य के साथ संध्या चार बजे बेतिया रेलवे स्टेशन पहुंचे। वहां से उन्हें हजारीमल धर्मशाला में जाना था। गांधी के साथ इतने लोगों को देख अंग्रेज एसडीओ लेविस डर गया और उसने हजारीमल को धमकाना शुरू कर दिया। जिसका परिणाम हुआ कि हजारीमल ने गांधी को धर्मशाला में रखने से इंकार कर दिया। अब राजकुमार शुक्ल, खेन्हर राव, रामाश्रय राव, पीर मो. मुनीस, गनपत राव, मुखलाल चौबे आदि लोगों में खलबली मची कि रात को गांधी को कहा ले जाया जाए। इसी बीच हजारीमल के भाई सूरजमल का संदेशा मिला कि धर्मशाला सिर्फ भैया का नहीं है उसमें मेरा भी हक है और मै किसी लेविस से नहीं डरता।

गांधीजी यहीं रुकेंगे। इसके बाद बेतिया की धरती पर गांधी की पहली रात हजारीमल धर्मशाला में गुजरी। इस यात्रा में गांधी 10 दिन चंपारण में रहे और विभिन्न गांवों का दौरा किया। यहीं से सत्याग्रह का शंखनाद किया। डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने अपनी पुस्तक चंपारण में गांधी में लिखा है कि हजारीमल धर्मशाला के मालिक हजारीमल के छोटे भाई सूरजमल ने गांधीजी की अगुआई धर्मशाला में की थी। और दिन की यात्राओं के बाद गांधी रात में हजारीमल में ही विश्राम करते और लोगों की शिकायतें दर्ज की जाती।

ढाई किमी की दूरी चार घंटे में हुई थी तय

चंपारण के गांधी पंडित राजकुमार शुक्ल के बुलावे पर पहली बार 22 अप्रैल 1917 को मोहनदास करमचंद्र गांधी बेतिया की भूमि पर आए थे। उनकी ट्रेन संध्या 4 बजे बेतिया रेलवे स्टेशन पर आई थी। लेकिन स्टेशन पर उनके चाहने वालों की भीड़ इतनी थी कि ट्रेन स्टेशन तक नहीं पहुंच पाई थी और लोगों ने उन्हें स्टेशन से बाहर ट्रैक पर ही उतार लिया। सीपीआईएम के पश्चिम चंपारण के मंत्री एवं बाबू खेन्हर राव के पोते प्रभुराज नारायण राव बताते हैं कि बापू जब स्टेशन से हजारीमल के लिए निकले तो उनके लिए सगड़ की व्यवस्था की गई थी। लोगों की अपार भीड़ देख सगड़ के घोड़े डर गए और चलना बंद कर दिया, तब लोगों ने सगड़ को खींचना शुरू कर दिया। इधर, गांधी की नजर जब सगड़ खींचते लोगों पर पड़ी तो वे उतर गए। काफी समझाने के बाद भी लोग नहीं माने और भीड़ साथ चलती रही। भीड़ की वजह से स्टेशन से हजारीमल धर्मशाला की दूरी करीब ढाई किमी चार घंटे में तय हुई थी।

चंपारण प्रवास के दौरान गांव-गांव गए थे गांधी

गांधी इन चंपारण में लिखा गया है कि जब भीड़ में साथ चल रहे लोग नहीं माने तो हजारीमल धर्मशाला जाने के पहले बेतिया स्टेशन से करीब एक किलोमीटर दूरी पर एक खेत में गांधी ने एक सभा की और वहां उपस्थित हजारों चंपारणवासियों व रैयतों को अंग्रेजी हुकूमत की त्रासदी से निजात दिलाने का आश्वासन दिया। यूं तो अपने चंपारण प्रवास के दौरान गांधी यहां के गांव-गांव गए। सबका दर्द जाना, भितिहरवा में कस्तूरबा करीब छह माह तक रहीं। 27 अप्रैल को गांधी के पास भितिहरवा गई।

उनसे मिले स्थानीय मठ के महंत रामनारायण दास की ओर से दी गई जमीन पर कुछ दिन बाद कुटी व पाठशाला बनवाया गया। कुटी में रहने के लिए गांधी आएंगे, इसकी जानकारी जैसे ही बेलवा कोठी के अंग्रेज अफसर को हुई उसने दोनों में आग लगवा दी। बाद में 16 नवंबर 1917 को स्थानीय लोगों ने यहां फिर से पाठशाला व कुटी का निर्माण किया। 20 नवंबर को गांधी दूसरी बार कस्तूरबा व अन्य के साथ भितिहरवा पहुंचे और वहां छह माह तक कस्तूरबा रहीं और यहां लड़कियों को शिक्षित करती रहीं। गांधी दस दिनों तक वृंदावन में भी रहे। अपनी सभी यात्राओं के दौरान गांधी चंपारण के गांव-गांव गए। पहले दस दिन के चंपारण प्रवास के दौरान गांधी लौकरिया, नौतन, सिंगाछापर, बेतिया डीह, साठी, सतवरिया, नरकटियागंज, भितिहरवा, मुरली भरहवा आदि का भ्रमण किया था और लोगों की शिकायत सुनी थी।

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