उम्मीद का दूसरा नाम आरएयू:कृषि के क्षेत्र में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर शोध कर रहा है पूसा विश्वविद्यालय

बेतिया2 महीने पहले
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कुछ समय पूर्व तक देश की युवा पीढ़ी पढ़-लिखकर केवल डॉक्टर, इंजीनियर या प्रशासनिक अधिकारी ही बनना चाहती थी। मगर अब ऐसा बिल्कुल भी नही हैं। बदलते वक्त के साथ अब कैरियर बनाने को लेकर युवाओं का रूझान भी बदलने लगा है। हाल के वर्षों में देश के युवा अब कृषि के क्षेत्र में भी अपना कैरियर तलाश रहे हैं। कृषि क्षेत्र से जुड़े देश के युवाओं के लिए पूसा स्थित राष्ट्रीय कृषि विश्वविद्यालय बेहतर विकल्प माना जा रहा है। इसको लेकर कृषि विवि के कुलपति डॉ. रमेशचंद्र श्रीवास्तव ने बताते हैं कि कृषि एवं इससे संबद्ध क्षेत्र में छात्रों के लिए सुनहरे अवसर हैं।

छात्र एग्रीकल्चर इंजीनियरिंग व कृषि से संबद्ध विभिन्न विषयों में विशेषज्ञता हासिल कर न सिर्फ रोजगार के अनेक अवसर प्राप्त कर सकते हैं, बल्कि देश की सेवा में भी अहम भूमिका निभा सकते हैं। उन्होंने कहा विश्वविद्यालय में कृषि के क्षेत्र में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, बायोटेक्नॉलॉजी, जीन ट्रांसफर, रिमोट सेंसिंग व अन्य आधुनिक तकनीकों शोध किया जा रहा है। जो देश के विकास में काफी सहायक होगा। उन्होंने युवाओं से आग्रह किया कि वे कृषि व इससे संबंधित क्षेत्र में रूचि लें। उन्होंने उम्मीद जताई कि कृषि के क्षेत्र में प्रतिभाशाली छात्रों के आने से छात्रों का भविष्य काफी बेहतर होगा।

स्थापना के 36 साल बाद पूसा कृषि विश्वविद्यालय को मिला केंद्रीय दर्जा

डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विवि पूसा की स्थापना 3 दिसंबर 1970 को हुई थी। उस समय इस विवि को लोग राजेंद्र कृषि विवि के नाम से जानते थे। यह संयुक्त बिहार का एकलौता एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी था। बाद में इसी विवि से अलग होकर बिरसा एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी रांची की स्थापना वर्ष 1981 में हुई। इतना ही नहीं, इसके बाद इस विवि का पुनः एक बार और विभाजन हुआ और वर्ष 2010 के दौरान बिहार एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी भागलपुर (सबौर) की स्थापना की गई। मौजूदा समय में केंद्रीय कृषि विवि पूसा भारत के कुल 70 कृषि विश्वविद्यालयों में से एक है।

राजेंद्र कृषि विवि पूसा को जुलाई 2014 में केंद्रीय विश्वविद्यालय बनाने का निर्णय लिया गया और अंततः यह विवि 6 अक्टूबर 2016 को केंद्रीय विवि में परिणत हो गया। बताया जाता है कि पूसा में कृषि संस्थान के नाम से लोकप्रिय भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान की स्थापना मूल रूप से एक अमेरिकी समाज सेवक मि. हेनरी फिप्स द्वारा दिए गए 30 हजार पाउंड की राशि के सहयोग से वर्ष 1905 में हुई थी। मूल रूप में यह संस्थान इम्पीरियल कृषि अनुसंधान संस्थान के नाम से जाना जाता था जो ब्रिटिश काल में स्थापित किया गया था।

वर्ष 1934 में बिहार में आए प्रलयंकारी भूकंप के दौरान इस संस्थान के मुख्य भवनों को काफी क्षति पहुंची तथा उसके तत्काल बाद इस संस्थान को नई दिल्ली स्थानांतरित कर दिया गया, जिसे आज भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली (पूसा कैंपस) के नाम से जाना जाता है। भयंकर और विनाशकारी भूकंप की त्रासदी झेलने के बाद पूसा में जो कुछ भी बचा उसे कृषि अनुसंधान स्टेशन कहा जाने लगा। अंततः 3 दिसंबर 1970 को भारत सरकार ने इस संस्थान का नामाकरण राजेंद्र कृषि विश्वविद्यालय के रूप में कर दिया।

विवि में स्नातक स्तर पर कृषि व उससे जुड़े 10 विषयों की होती है पढ़ाई

इस विश्वविद्यालय में स्नातक स्तर पर कृषि व कृषि से संबद्ध 10 विषयों की पढ़ाई होती है। इसमें एग्रीकल्चर, हॉर्टिकल्चर, फॉरेस्ट्री, फिशरीज, एग्रीकल्चर इंजीनियरिंग, बायोटेक्नोलॉजी, कम्युनिटी साइंस, फूड टेक्नोलॉजी, डेरी टेक्नोलॉजी एवं सेरीकल्चर शामिल है। वीसी ने बताया कि युवा कृषि क्षेत्र में अपनी पढ़ाई पूरी कर अपना कैरियर बना सकते हैं। यहां दाखिला लेने वाले छात्रों को आईसीएआर नई दिल्ली की प्रवेश परीक्षा को हर हाल में पास करना होता है। ऐसे युवा जिन्हें एग्रीकल्चर इंजीनियरिंग और डेयरी टेक्नोलॉजी की पढ़ाई करनी है, उनका गणित विषय से 12वीं पास होना अनिवार्य होता है। जबकि बायोलॉजी से 12वीं पास करने वाले छात्र बाकी के सभी कृषि से संबद्ध विषयों में नामांकन लेकर अपनी पढ़ाई पूरी कर सकते हैं।

उन्होंने बताया कि देश के विभिन्न कृषि विश्वविद्यालयों में जहां कृषि व कृषि से संबद्ध 95 विषयों में स्नाकोत्तर की पढ़ाई होती है। वहीं इनमें से 80 विषयों में पीएचडी की पढ़ाई भी होती हैं। उन्होंने बताया कि केंद्रीय विवि में स्नातक में प्रवेश के लिए 12वीं के सिलेबस पर आधारित परीक्षा आईसीएआर के माध्यम से आयोजित होती है। इसके अलावे 12वीं के सिलेबस के आधार पर ही राज्य के कृषि विश्वविद्यालयों में नामांकन के लिए विभिन्न राज्य विभिन्न एजेंसियों के माध्यम से प्रतियोगिता परीक्षा का अयोजन कराती है। उन्होंने कहा कि राज्य के विश्वविद्यालयों में नामांकन के लिए राज्य स्तरीय प्रतियोगिता परीक्षा पास करना जरूरी होता है। आईसीएआर की परीक्षा उतीर्ण होने के बाद ऑल इंडिया रैंकिंग के अनुसार छात्रों को विभिन्न कृषि विश्वविद्यालयों में उनके ऑप्शन और रैंकिंग के अनुसार प्रवेश दिया जाता है। इसी तरह राज्यों के विश्वविद्यालयों में रैंकिंग के अनुसार छात्रों को प्रवेश दिया जाता है।

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