अच्छी जगह:तमसा, सोनभद्री व मनोर नदी में जलक्रीड़ा करते थे जंगली भैंसे, इसलिए नाम पड़ा था भैंसालोटन

बेतिया3 महीने पहले
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  • 14 जनवरी 1964 को तत्कालीन राज्यपाल की घोषणा पर भैंसालोटन का नाम वाल्मीकिनगर हुआ

बराज निर्माण से पहले गंडक के किनारे कई छोटे-छोटे गांव और छोटी छोटी नदियां प्रवाहित थी। उन दिनों तमसा, सोनभद्री, मनोर आदि छोटी-छोटी नदियों के पानी में बड़े सिंगो और भारी शरीर वाले नर और मादा जंगली भैंसा जल क्रीड़ा किया करते थे । नदियां अधिक गहरी नहीं थी इसलिए इन जंगली भैंसों को जल क्रीड़ा करने में बड़ा ही आनंद आता था। चंपापुर,गोनौली, तरूआबारी, चकदहवा और सुस्ता गांव में रहने वाली स्थानीय जाति मसलन उरांव,सोखीईत, काजी, खतईत आदि जाति के लोग इन भैंसों की जल क्रीड़ा को देखते हुए इस जगह का नाम वर्षों पहले भैंसालोटन कर दिया।

स्वच्छंद माहौल में जंगली भैंसों की संख्या में तेजी से वृद्धि हुई। 28 अप्रैल 1963 को बिहार के तत्कालीन राज्यपाल अनंत शयनम आयंगार भैंसालोटन में गंडक बराज का निरीक्षण करने आए थे। महंत धनराज पुरी के कहने पर राज्यपाल सहित सभी लोग ‘वाल्मीकि आश्रम’ देखने गए थे। प्राकृतिक खूबसूरती से लबरेज इस क्षेत्र का नाम भैंसालोटन होना शायद उस समय के साहित्यकारों, भारत नेपाल के अधिकारियों और गणमान्य लोगों को उचित नहीं लगा। वाल्मीकि आश्रम की महत्ता को देखते हुए तत्कालीन राज्यपाल की 20 अगस्त 1963 को इसका नाम वाल्मीकि नगर करने की घोषणा कर दी। जिसके बाद 14 जनवरी 1964 को भैंसालोटन का नाम सरकारी स्तर पर वाल्मीकि नगर हो गया।

वीटीआर में फिलहाल 250 से अधिक हैं गौर यानी जंगली भैंसा

पूर्व का भैंसालोटन यानी आज का वाल्मीकि नगर नारायणी नदी के तट पर बसा है। यह अनुपम प्राकृतिक सौंदर्य के बीच स्थित है। महर्षि वाल्मीकि का आश्रम इसी नेशनल पार्क में भारत नेपाल सीमा पर घने जंगलों मे स्थित है जहां पर देश-विदेश से पर्यटक पहुंचते हैं। वीटीआर के जंगलों में गौर यानी जंगली भैंसा बहुतायत संख्या में पाए जाते हैं। इस चौपाया जानवर की संख्या वीटीआर में फिलहाल 250 से अधिक है। मोटर अड्डा, वाल्मीकि नगर, गोनौली गोवर्धना और मंगुराहा में पाए जाने वाले इस चौपाया जानवर को बहुतायत से देखा जाता है। तेजी से प्रजनन के कारण इसकी संख्या में इजाफा हो रहा है।

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