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ये तस्वीर बदलनी चाहिए:मुझे राजनीति का मुद्दा मत बनाओ क्योंकि, मैं युवाओं के रोजगार की उम्मीद हूं .... मैं अशोक पेपर मिल हूं

दरभंगा16 दिन पहले
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  • 16 अगस्त 2000 को गोधा ने उत्पादन शुरू कराया, लेकिन क्वालिटी घटिया
  • हायाघाट के बलहा में 1983 से बंद पड़ा हुआ है अशोक पेपर

मैं मिथिला की शान हूं। बिहार का धरोहर हूं। युवाओं के लिए रोजगार की उम्मीद हूं। .... हां, मैं अशोक पेपर मिल हूं। अपनी अस्तित्व में लौटने के लिए मैं 37 साल से तारणहार के इंतजार में हूं। मैं वहीं पेपर मिल हूं, जिसकी क्वालिटी की मुरीद पुरी दुनिया थी। प्रकाशन कंपनियों व संस्थानों की पहली डिमांड थी। बिहार को कागज उत्पादन की पहचान दिलाई। अपने जीवन काल में हजारों परिवार की मुस्कान बनी। कामगारों से लेकर व्यवसायियों को रोजगार दिया। लोगों को शिक्षित और समृद्व बनाया।

विडंबना है - जब आबादी व रोजगार की जरूरत कम थी तब मुझे अस्तित्व में रखा गया। आज देश को मेक इन इंडिया के तहत स्वदेशी उत्पादन और प्रदेश में रोजगार सृजन के लिए जब हमारी ज्यादा जरूरत है तो, मुझे बंद रखा गया है। उत्पादन शुरू कराने के नाम पर सियासत का केन्द्र बना दिया गया। चुनाव के समय ही सरकार व राजनीतिक दलों को मेरी याद आती है। इलेक्शन बीतते सभी अपने वादे भूल जाते हैं। अब मेरी पहचान औद्यौगिक विकास से भटक कर चुनावी मुद्दे हो होने लगी है। सरकार और सिस्टम की उपेक्षा से अब तो मेरे वजूद पर संकट गहराने लगा है। भू-माफियाओं की नीयत जमीन हड़पने के फिराक में लगी है। कई हिस्सों पर लोगों ने अतिक्रमण भी कर रखा है। मेरे वंशजों .... एक बार मुझे अस्तित्व में लाकर देखो, भरोसा देती हूं कि दरभंगा की मुस्कान फिर कभी फीकी नहीं पड़ेगी।
50 हजार से ज्यादा लोग जुड़े थे रोजगार से : मिल में करीब दो हजार कामगार नौकरी पर थे। इनमें से 800 लोग नियमित और 1200 कर्मचारी कैजुअल ड्यूटी पर थे। इस मिल के कर्मचारी व मजदूर पंचायत के मुख्य संरक्षक शुभ कांत झा व बतौर सुपरवाइजर के पद पर काम कर चुके हैं। उनके सहकर्मी अखिलेश्वर मिश्र ने बताया कि उत्पादन और डिमांड इतना था कि परिवहन के लिए रेल लाइन बिछाई गई थी। पूरे जिले में खुशहाली थी। कामगारों के अलावे 50 हजार से ज्यादा लोग पेपर के व्यवसाय और इसके रोजगार से जुड़े थे।
37 साल में नहीं मिला तारणहार, अब 400 एकड़ जमीन पर गड़ी है भू-माफियाओं की नजर

दरभंगा महराज की मौत के बाद : राजनीति के भंवर में फंस गई धरोहर

40 साल पहले मिथिला की अनार्थिक समृद्धि का एक सशक्त माध्यम कागज का उत्पादन था। जिला मुख्यालय दरभंगा से 8 किलोमीटर दूर हायाघाट प्रखंड के बलहा गांव में बंद पड़ा अशोक पेपर मिल वर्ष 1983 से बंद पड़ा है। वर्ष 1960 में तत्कालीन मुख्यमंत्री पंडित विनोद नंद झा, पटना के बैद्यनाथ आयुर्वेद भवन व दरभंगा के महाराजा कामेश्वर सिंह के प्रयास व पंूजी में हिस्सेदारी से 400 एकड़ जमीन पर इस मिल की आधारशिला रखी थी। तब इसके निर्माण पर करीब 5 करोड़ की लागत आ रही थी। शिलान्यास के दो साल बाद साल 1962 में भारत और चीन की लड़ाई शुरू हो गई थी। चाइना वार की वजह से प्राइस इंडेक्स के कारण इसकी लागत बढ़ कर 8 करोड़ हो गई थी। उसी दौरान दरभंगा महाराज की मृत्यु हो गई थी।

इससे निर्माण कार्य ठंडे बस्ते पड़ गया था। वर्ष 1971 में सूबे के तत्कालीन मुख्यमंत्री भोला पासवान शास्त्री की नजर इस बंद मिल पर पड़ी। उनके प्रयास से बिहार सरकार व असम सरकार के संयुक्त तत्वावधान में मिल का निर्माण शुरू हुअा। साल 1975 से इस मिल से विभिन्न प्रकार के कागजों का उत्पादन शुरू हो गया। वर्ष 1982 तक मिल अच्छे तरीके से चला। यहां के कागज की डिमांड विदेशों में ज्यादा थी। बाद में सरकारी उदासीनता व अन्य पेपर मिलों की साजिश से उत्पादन घटते गया और 1983 में मिल बंद हो गई।

सुप्रीम कोर्ट ने चालू करने का दिया था आदेश
1995 में वामपंथी नेता व हायाघाट के विधायक रहे उमा धार सिंह ने बंद मिल को चालू करवाने के लिए 4 जनवरी 1995 को सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी। सुप्रीम कोर्ट ने मिल को प्राईवेट करते हुए 18 अगस्त 1997 को इस कंपनी को चलाने की जिम्मेदारी मुंबई की एक कंपनी एनसीएफएल को दे दी। मिल के संचालन के लिए 504 करोड़ की स्कीम बनाई थी। दो फेज में मिल का जीर्णोद्धार होना था।

जमीन पर अतिक्रमण
बंद पड़े अशोक पेपर मिल की 400 एकड़ जमीन पर अब भू-माफियाओं की नजर गड़ गई है। लोग जमीन पर कब्जा के नए-नए हथकंडे अपना रहे हैं। मिल परिसर के कई हिस्से को लोगों ने अतिक्रमित कर रखा है।

37 साल में सात विस चुनाव में बना मुद्दा

अशोक पेपर मिल आज अपने वजूद की लड़ाई लड़ रहा है। लोगों की उम्मीद जगती है कि शायद मिल चालू हो जाए, लेकिन चुनाव बीतते ही सभी वादे भूल जाते हैं। 37 सालों में पार्लियामेंट के 7 और विधान सभा के 8 चुनाव संपन्न हो चुके हैं। हर बार अशोक पेपर ही यहां चुनावी मुद्दा बना है। इस बार भी विधान सभा चुनाव में एक बार फिर से यह सियासत का केन्द्र बना है।

जिसको मिली जिम्मेदारी, उसी ने की गद्दारी

एनसीएफएल कंपनी के चेयरमेन धर्मगोधा की नीयत में खोट में थी। स्थानीय लोगों ने इसका विरोध शुरू कर दिया। गोधा ने न्यायालय का आदेश नहीं माना। 16 अगस्त 2000 को गोधा ने मिल में उत्पादन शुरू करवाया। उस समय वेस्टेड पेपर से केवल राइटिंग पेपर का उत्पादन शुरू हुआ । जिसकी गुणवत्ता बहुत ही घटिया थी। जिसके कुछ दिनों बाद ही मशीन की खराबी को ठीक कराने के नाम पर गोधा ने यहां से फ्रांस व जर्मन निर्मित मशीन को ले गया। जो आजतक ठीक होकर वापस नहीं आया। जब राबड़ी देवी मुख्यमंत्री बनी तो एक जांच कमीशन का गठन किया गया। जिसके डर से 12 नवम्बर 2003 को मिल में ताला लगाकर गोधा फरार हो गया। तब से यह मिल बंद है। कानूनी लड़ाई चल रही है।

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