226 वर्ष कर्णाट वंश:सीतामढ़ी के नानपुर में बनी थी पहली छावनी, नेपाल के सिमरौनागढ़ होते हुए दरभंगा बनी राजधानी

दरभंगा3 महीने पहले
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  • कर्णाट शासन काल को कहा जाता है स्वर्ण युग, संस्थापक राजा नान्यदेव ने किया था 50 वर्ष राज

सरकारी वेबसाइट पर मुजफ्फरपुर के इतिहास की चर्चा के क्रम में सिमराॅव वंश (1097 से 1323 ई. तक) का उल्लेख किया गया है। लिखा है कि मुजफ्फरपुर का इतिहास सिमरॉव वंश (पूर्वी चंपारण के पूर्वोत्तर भाग में) और इसके संस्थापक कर्णाटवंशीय राजा नान्यदेव के संदर्भ के बिना अधूरा है। राजवंश के अंतिम राजा हरसिंह देव के शासनकाल के दौरान, तुगलक शाह ने 1323 में तिरहुत पर आक्रमण किया और क्षेत्र पर नियंत्रण प्राप्त किया। तुगलक शाह ने तिरहुत के प्रबंधन को कामेश्वर ठाकुर को सौंप दिया।

इस प्रकार, तिरहुत की संप्रभु शक्ति हिंदू प्रमुखों से मुसलमानों तक जाती रही, परन्तु हिंदू प्रमुख निरंतर पूर्ण स्वायत्तता का आनंद उठाते रहे। सरकारी वेबसाइट पर इसके अतिरिक्त विशेष जानकारी उपलब्ध नहीं है। हवलदार त्रिपाठी सहृदय की पुस्तक बिहार की नदियां में कर्णाट वंश के राजाओं का जगह-जगह उल्लेख किया गया है। कहा गया है कि पूर्वी चंपारण जिले के घोड़ासाहन के उत्तर से अनुरवा नदी दक्षिण की ओर से आती है। जो जमुई कहलाती है। इसी के किनारे नेपाल के बारा जिला का सिमराैनागढ़ (घाेड़ासाहन से 15 किमी उत्तर) नाम की नगरपालिका है।

सिमराैनागढ़ काे तब सिमराॅव गांव के रूप में जाना जाता था। कर्णाट वंश के राजाओं ने उन क्षेत्रों को नियंत्रित किया, जिन्हें आज हम भारत और नेपाल में तिरहुत या मिथिला के रूप में जानते हैं। यह क्षेत्र पूर्व में महानंदा नदी, दक्षिण में गंगा, पश्चिम में गंडक नदी और उत्तर में हिमालय से घिरा है। सुगौली संधि के बाद दोनों देशों के बीच सीमा रेखा बन गई है। 1097 से 1323 ई. तक मिथिला की राजधानी इसी सिमराॅव गांव में थी। कर्णाट वंशी क्षत्रिय राजा नान्यदेव ने मिथिला को जीतकर यहां 1097 ई. में अपनी राजधानी स्थापित की थी।

यह किलेदार शहर था। यह नगर चतुर्भुज आकृति में बसाया गया था। जिसके परकोटे 14 मील में फैले हुए थे। परकोटे के भीतरी भाग का व्यास 10 मील में विस्तृत था। नान्यदेव ने करीब 50 वर्ष तक शासन करते हुए पूरे मिथिला और नेपाल पर अपनी शक्ति बढ़ा दी। कर्णाट शासकों के वंश काल को मिथिला का स्वर्ण युग भी कहा जाता है।

कर्णाट वंश के अंतिम राजा हरि सिंह देव के मंत्री कामेश्वर ठाकुर ने की ओइनवार वंश की स्थापना

इतिहासकाराें के अनुसार, नान्यदेव ने चालुक्य राजा विक्रमादित्य षष्टम की मदद से सिमरॉव गढ़ पर अपना वर्चस्व स्थापित किया। विक्रमादित्य षष्ठम के शासन के बाद उन्होंने आधुनिक बंगाल और बिहार पर सफल सैन्य अभियान का नेतृत्व किया। नान्यदेव के साथ सेन वंश राजाओं से युद्ध होते रहता था। कर्णाट वंश के शासक नरसिंह देव बंगाल के शासक से परेशान होकर उसने तुर्की का सहयोग लिया। उसी समय बख्तियार खिलजी भी बिहार आया और नरसिंह देव को धन देकर उसे सन्तुष्ट कर लिया।

बिहार और बंगाल पर ग्यासुद्दीन तुगलक ने 1324-25 ई. में अपना शासन स्थापित कर लिया। उस समय मिथिला के शासक हरि सिंह देव थे। उन्होंने अपने योग्य मंत्री कामेश्वर ठाकुर को अगला राजा नियुक्त किया। इस प्रकार उत्तरी और पूर्व मध्य बिहार से कर्णाट वंश 1325 ई. में समाप्त हो गया और मिथिला में नवीन राजवंश का शासन शुरू हुअा जाे बाद में ओइनवार वंश के नाम से जाना जाता है। ओइनवार वंश के शासन तक मिथिला में स्थिरता और प्रगति हुई। ओइनवार राजवंश भारतीय उपमहाद्वीप के मिथिला क्षेत्र में शासन करने वाला एक राजवंश था जिसे सुगौना राजवंश भी कहते हैं। उन्होंने 1325 ई. और 1556 ई. के बीच इस क्षेत्र पर शासन किया। इस राजवंश के अंत के बाद दरभंगा राज के राजवंश का उदय हुआ।

मिथिला पर विजय प्राप्त करने के बाद नानपुर में नान्यदेव ने किया था निवास
मिथिला पर विजय प्राप्त करने के बाद (1097 ई. से पूर्व) पहले-पहल नान्यदेव ने सीतामढ़ी के पुपरी के पास स्थित ऐतिहासिक गांव नानपुर में अपना निवास कायम किया। गढ़ की नींव में साेने का सर्प और फन पर संस्कृत श्लाेक खुदवा कर गड़वाया। इससे स्पष्ट हाेता है कि नानपुर में नान्यदेव से पहले अलर्क नाम का काेई राजा भी था, जिसका गड़ा धन नान्यदेव काे मिला था। जहां धन मिला था उस स्थान पर अाज भी सर्प की पूजा हाेती है। बाद में जब कर्णाट वंश की राजधानी सिमराॅव गई, तब भी नानपुर में उनके पुत्र गंगदेव रहते थे। गंगदेव एक याेग्य शासक थे। उन्होंने ही नानपुर के बगल में गंगवारा नामक गांव काे बसाया था। 1147 ई. से 1187 ई. के बीच उन्होंने मधुबनी जिले के अंधराठाढ़ी में विशाल गढ़ बनवाया था।
हरि सिंह देव के शासन में शुरू हुई मैथिल ब्राह्मणों की पंजी व्यवस्था : मिथिला के इतिहास में हरिसिंह देव के शासनकाल को एक महत्वपूर्ण मोड़ माना गया है। उन्होंने ही मैथिल ब्राह्मणों के लिए चार वर्ग प्रणाली की शुरुआत करते हुए पंजी व्यवस्था को विकसित किया। उनके वंशजों ने नेपाल के मल्ल वंश की स्थापना की, जिसने लगभग 300 वर्षों तक शासन किया।

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