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जागरूकता:मानव जीवन का एकमात्र लक्ष्य है दुःख रहित सुख अर्थात आनंद की प्राप्ति : विष्णुकांत

दरभंगा3 दिन पहले
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सुख एवं आनंद में आकाश- पाताल का अंतर है। सुख क्षणिक होता है। सुख के बाद दुःख अवश्यंभावी है। आनंद शाश्वत रहने वाला होता है। जिसने एकबार आनंद समुद्र में डूबा,उसे फिर कभी दुःख होना संभव नहीं है। क्योंकि, आनंद एवं दुःख विरोधाभासी है। लहेरियासराय स्थित संत निवास में सत्संग के क्रम में व्रजवासी संत विष्णुकांत ने ये बातें कही। उन्होंने कहा कि सूर्य को अंधकार से कभी परिचय नहीं होता। जिस सूर्य ने अंधकार देख लिया वह सूर्य हो नहीं सकता। उसी प्रकार दुःख रहित सुख ही तो आनंद है। मानव जीवन का एकमात्र लक्ष्य है दुःख रहित सुख अर्थात आनंद की प्राप्ति। उन्होंने कहा कि मानव को अपने जीवन में ही इस बात को गंभीरता से समझने की जरूरत है। अगर हम बार-बार सुख व दु:ख की झमेला में पड़ते रहेंगे तो फिर जन्म-मृत्यु रूपी चक्र कभी समाप्त नहीं होगा। हम जीव मात्र के अंतिम लक्ष्य आनंद को प्राप्त करने से वंचित रहकर जन्म-जन्म तक भटकते रहेंगे। हमें इस भटकाव को भगवान के साथ संबंध स्थापित कर रोकना ही होगा। दूसरा कोई उपाय नहीं है।

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