एमएलएसएम कॉलेज में हुआ आयोजन:कहानी ‘दुखां दी कटोरी, सुखां दा छल्ला’ के माध्यम से भारत विभाजन के समय महिलाओं के संघर्ष को किया गया है उजागर

दरभंगाएक महीने पहले
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संगोष्ठी को संबोधित करती रूपा सिंह। - Dainik Bhaskar
संगोष्ठी को संबोधित करती रूपा सिंह।
  • पंजाब के लोक जीवन, परिवेश और संस्कृति को भी समेटा गया है : डॉ. रूपा

एमएलएसएम कॉलेज के हिंदी विभाग की ओर से सोमवार को कॉलेज के सभागार में समकालीन हिंदी कहानी की चर्चित हस्ताक्षर डॉ रूपा सिंह के कहानी पाठ का आयोजन किया गया। उन्होंने अपनी कहानी “दुखां दी कटोरी, सुखां दा छल्ला “ का पाठ किया। पंजाब के लोक जीवन, परिवेश और संस्कृति को समेटे यह कहानी भारत - विभाजन की पृष्ठभूमि में बेबो नामक वयोवृद्ध स्त्री के अन्तस्संघर्ष को मार्मिकता के साथ उजागर करती है। कहानी की समीक्षा करते हुए प्रो चंद्रभानु प्रसाद सिंह ने कहा कि कहानी के भीतर से कहानी निकालने की भारतीय कथा धारा को इस कहानी में रूपा सिंह ने बखूबी आगे बढ़ाया है। कहानी दोहरे स्तर पर आगे बढ़ती है । इसमें एक ओर बेबो और शमशेर की कथा है तो दूसरी ओर कथावाचक और तोषी की कथा। कहानीकार ने इन दोनों कथाओं को संतुलन के साथ साधनों में सफलता हासिल की है। उन्होंने कहा कि यह कहानी भारत- विभाजन की नहीं , स्त्री विमर्श की कहानी है।

भारतीय नारी के आंतरिक संघर्ष को अभिव्यक्त किया गया है : आशा प्रभात
सुप्रसिद्ध रचनाकार आशा प्रभात ने कहा कि कहानी में बेबो के माध्यम से भारतीय नारी के आंतरिक संघर्ष को गहरी संवेदना के साथ अभिव्यक्त किया गया है। बेबो तमाम तकलीफों के बीच भी छल्ले के रूप में शमशेर के प्रथम प्रेम की स्मृति को आजीवन संजोए रखती है। डॉ कृष्ण कुमार झा ने भी ऐसी सफल और प्रभावशाली कहानी की रचना के लिए रूपा सिंह को बधाई दी। आरंभ में प्रधानाचार्य प्रो. मंजू चतुर्वेदी ने महाविद्यालय परिवार की ओर से रूपा सिंह को सम्मानित किया।

स्वागत भाषण हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ. अमरकांत कुमर ने किया ।कार्यक्रम का संचालन डॉ. सतीश कुमार सिंह ने किया और धन्यवाद ज्ञापन किया डॉ. तीर्थनाथ मिश्र ने। इस अवसर पर डॉ. नरेंद्र, श्याम भास्कर, प्रो चंद्रशेखर झा, डॉ राजकिशोर झा, डॉ महेश ठाकुर, बर्सर डॉ विनय कुमार झा, डॉ. ऋषिकेश कुमार, डॉ. ज्वाला चंद्र चौधरी, डॉ अजय कुमार, डॉ. जेबा प्रवीण, प्रो कासिम, अनूप कुमार झा आदि उपस्थित थे। कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रधानाचार्य प्रो. मंजु चतुर्वेदी ने की।

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