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नवरात्र:दक्षिणेश्वरी काली को नाै दिनों में तीन तरह के लगाए जाते भोग, यहां दर्शन को झारखंड, असम और प. बंगाल से भी आते हैं लोग

दरभंगा2 दिन पहले
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सैदनगर मंदिर की मां काली की प्रतिमा।
  • लहेरियासराय-समस्तीपुर रोड में स्थित सैदनगर का काली मंदिर लोगों के आस्था का है केंद्र

(राकेश कुमार नीरज) लहेरियासराय-समस्तीपुर रोड में स्थित सैदनगर का काली मंदिर आस्था का केंद्र है। यहां नेपाल व पड़ोसी राज्य झारखंड, असम और प. बंगाल आदि से भी उपासक साधना करने आते हैं। दक्षिणेश्वरी काली की पूजा को लेकर यहां श्रद्धालुओं की भीड़ जुटने लगी है। यहां की खासियत है कि एक दिन दशमी को छोड़ कर सभी दिन माता काली को मांसाहारी भोग लगता है। यह भोग खस्सी, मछली और कबूतर का भी होता है।

यहां भगवती को मछली का भोग इस दुर्गा पूजा के त्योहार में भी एक दिन छोड़ कर सभी नौ दिन लगता है। मगर नियम से यहां सोमवार, बुधवार और शुक्रवार को मछली का भोग लगता है। वहीं, शनिवार, मंगलवार को कबूतर का भोग जबकि अन्य दिन यहां छागर का भोग चढ़ाया जाता है।

तंत्र विद्या के लिए अलग से बनाए गए हैं कमरे

तंत्र विद्या के लिए यहां मंदिर के पूरब उत्तर साधकों का कक्ष बना है। इसमें हवन आदि की व्यवस्था है। बगल में बंगला मुखी भगवती की भी मंदिर बनी है। माता काली के मंदिर में पूरब उत्तर तरह कलश स्थापना होता रहा है। सुबह से देर शाम तक यहां दूर-दराज से लोग पूजा करने पहुंचे हैं। यहां डेढ़ सौ वर्ष पुरानी परम्पराओं के बीच माता की पूजा-अर्चना की जाती है।

काली के साथ उनकी योगिनी की भी होती पूजा

यहां पूर्व में मिट्टी और अन्य धातुओं से बना काली की प्रतिमा स्थापित थी। पंडित राधाकांत झा के बाद उनके पुत्र महावीर झा और अब कुछ वर्षों से इनके महावीर झा के पोता सुमन झा माता के मुख्य पुजारी है। इनके सहयोग में इनके भाई दिवाकर झा, साला अमित झा आदि दस दिनों के लिए दुर्गा पूजा में मदद को लगे रहते हैं। माता काली के दोनों बगल जया और विजया योगिनी की भी प्रतिमा लगी है।

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