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पूजा का आयोजन:थारू समाज के लोगों ने पीपल की पूजा कर परंपरा को निभाया

गौनाहा12 दिन पहले
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  • प्रतिवर्ष सावन माह के अंतिम सप्ताह में पूजा का होता है आयोजन

इंडो नेपाल बॉर्डर के अरावली पर्वत श्रृंखला के आसपास बसे थारू जनजातियों में सावन महीने के आखिरी सप्ताह में गांव गांव में पीपल की पूजा अर्चना ब्रह्मा के रूप में आयोजित की गई । ऐसी पूजा करने की परम्परा शादियों से चली आ रही है। इस पूजा में शामिल होने के लिए थारु पुरुष और महिलाओं में अत्यधिक उत्साह देखा जाता है लेकिन इस बार लॉकडाउन के कारण इस पूजा में बहुत कम संख्या में लोग शामिल हो पाए । यह एक ऐसी पूजा है जिसमें गरीब व अमीर सभी भाग लेते है परंतु लॉक डाउन की वज़ह से सोशल डिस्टेंस का पालन करते हुए थारू जनजाति के लोग अपने पूर्वजों द्वारा बनाई गई परम्परा को निभा रहे है।

पूरे थारू समाज में मैनाटांड़ प्रखंड से लेकर बाल्मीकि नगर तक के थारू जनजातियों में पीपल के वृक्ष के पूजा की गई। थारू महासंघ के पूर्व महा सचिव सह पूर्व मुखिया 85 वर्षीय इंद्रजीत चौधरी ने बताया कि पीपल की पूजा करने की परंपरा कब से है हमें भी मालूम नहीं फिर भी आज तक पूर्वजों द्वारा बनाई परम्परा को निभाते आ रहे है। आगे आने वाला जनरेशन इस परंपरा को निभा पाया कि नहीं कहना मुश्किल है । वही थारू महासंघ के पूर्व अध्यक्ष शिव प्रसाद ने बताया कि अभी भी हम अपने पूर्वजों द्वारा बनाए परंपरा को निभाते आ रहे हैं यह परंपरा पूरी थारू जनजाति लोग निभाते आ रहे हैं।

पुजारी रामेश्वर भगत ने बताया कि पीपल की पूजा करना हमारी सदियों से परंपरा रही है। हम सब को विश्वास है कि पीपल के वृक्ष में ही ब्रह्मा का निवास होता है। इसलिए इनकी पूजा करने से गांव व समाज में किसी प्रकार की बधाई नहीं आती है। गांव के लोग खुशहाल एवं शांतिमय जीवन व्यतीत करते हैं।

खीर और आटे से बने लड्‌डू काे चढ़ाया, प्रसाद का किया वितरण
गांव की महिलाएं खीर व चावल के आटे से बनी लड्डू बनती है और यही खीर व लड्डू पीपल के वृक्ष को चढ़ाते हैं। पूजा अर्चना होने के बाद इस प्रसाद को गांव के इन लोगों के बीच वितरण किया जाता है। जो भी व्यक्ति पीपल के वृक्ष रुपी ब्रह्मा पूजा के लिए बैठते हैं उन्हें समाज द्वारा नए वस्त्र सिलवा कर कर दिए जाते हैं उसी वस्त्र पहन कर वह व्यक्ति पूजा स्थल पर बैठता है। पूजा स्थल में वहीं व्यक्ति बैठते हैं जिन्हें समाज चुनते हैं। पूजा के दिन गांव के थारू जनजाति के पुरुष व महिला पीपल के वट वृक्ष को पानी से अच्छी तरह धोकर ,आस पास गोबर व पानी की लेप लगाकर साफ करते है। वृक्ष को नया वस्त्र पीला मर्दानी पहनाया जाता है और विधिवत इसकी पूजा और अर्चना की जाती है।

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