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नवरात्र का पहला दिन:बिहार के सबसे ऊंचा दुर्गा मंदिर में पहले दिन नहीं हुआ कोई सांस्कृतिक कार्यक्रम, सेनेटाइजर के बाद दिया प्रवेश

जयनगर10 दिन पहले
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  • श्रद्धालु भगवान की प्रतिमाओं को स्पर्श नहीं करेंगे, शैलपुत्री की पूजा हुई

बिहार के सबसे ऊंचा दुर्गा मंदिर में तांत्रिक विधि से कलश स्थापना के साथ 9 दिनों तक चलने वाली दुर्गा पूजा शुरू हो गई है। पौराणिक व तांत्रिक विधि से माता की प्रथम रूप शैल पुत्री देवी की पूजा अर्चना की गई। काफी संख्या में श्रद्धालु माता की प्रथम रूप की दर्शन व पूजा अर्चना किया। पूजा आयोजक द्वारा कोरोना गाइडलाइन का पूरी तरह ध्यान रखा जा रहा है। मंदिर के गर्भगृह में 5 से 7 लोग होते है। इस बार मंदिर परिसर में न तो पंडाल का निर्माण किया गया है। और न ही किसी प्रकार की सांस्कृतिक कार्यक्रम।

मुख्य द्वार पर सेनेटाइजर व अन्य आवश्यक वस्तु की व्यवस्था की गई है। दुर्गा पूजा यानी नारी शक्ति की पूजा। नवरात्र में नारी शक्ति के उन विभिन्न रूपों की पूजा की जाती है जो सृष्टि के आदि समय से इस संसार को संचालन करती आ रही है। घोड़े पर सवार मां दुर्गा अपनी अष्ट भुजाओं में शंख चक्र गदा धनुष तलवार त्रिशूल और कमल धारण की हुई है। मां दुर्गा की इस रूप में ममता दया शांति श्रद्धा कांति भक्ति सहनशीलता करुणा और अन्नपूर्णा की समावेश है। जो भारतीय नारी की आभूषण है।

जिसे आदर और सम्मान किए बिना न विकास संभव है और न ही संसार का संचालन संभव है। मंदिर में प्रवेश करने से पूर्व श्रद्धालु अपने हाथों को हैंडवाश या सेनेटाइजर से साफ करेंगे। कोरोना वायरस संक्रमण को रोकने के ख्याल से मंदिर के कमेटी ने निर्णय लिया है। श्रद्धालु भगवान की प्रतिमाओं को स्पर्श नहीं करेंगे। मंदिर परिसर में हाथ धोने के लिए हैंडवाश, साबुन, जल व की व्यवस्था की गई है।
16 साल पूर्व शंकराचार्य ने किया था प्राण प्रतिष्ठा : 16 साल पूर्व 3 जून 2004 को गोवर्धन के शंकराचार्य स्वामी निश्चलानन्द सरस्वती जी महाराज ने विधि विधान के साथ मां दुर्गे की प्रतिमा के साथ अन्य देवी-देवताओं का प्राण - प्रतिष्ठा किया था। सभी प्रतिमा संगमरमर का बना है। अलौकिक शक्ति से परिपूर्ण मइया की दरबार में पहुंचते ही श्रद्धालु ऊर्जावान हो जाते है।

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