छठ महापर्व काे लेकर तैयारी शरू:प्रकृति की पूजा है छठ महापर्व इसके केंद्र में रहते हैं सूर्य देव

जयनगर22 दिन पहले
  • कॉपी लिंक

लोक आस्था का महापर्व छठ लोगों को सीधे प्रकृति से जोड़ता है और साथ ही स्वच्छता की सीख भी देता है। छठ पर्व कार्तिक मास की षष्ठी तिथि को मनाया जाता है और षष्ठी तिथि एक विशेष खगोलीय अवसर है। इस समय सूर्य की पराबैंगनी किरणें पृथ्वी की सतह पर सामान्य से अधिक मात्रा में एकत्र हो जाती है। छठ पर्व सके संभावित कुप्रभावों से रक्षा करने का सामर्थ्य है।

सूर्यास्त और सूर्योदय के समय सूर्य को अर्ध्य देने के दौरान इसकी रोशनी के प्रभाव में आने से कोई भी चर्म रोग नहीं होता है तथा इंसान निरोग रहता है। साथ ही इससे आंखों की ज्योति भी बढ़ती है। षष्ठी (डूबते सूर्य) और सप्तमी (उगते सूर्य) को सूर्य को अर्घ्य देने से सुषुम्ना नाड़ी जागृत होती है। इस चरण में सूर्य की ऊर्जा आंखों से पिनियल ग्रन्थियां तक पहुंचती है जिसके कारण शरीर के अंदर ग्रन्थियां एक्टिवेटेड हो जाती है।

जैसे ही पिनियल ग्रंथि जागृत होती है तो रीढ़ तरंगित होकर शरीर के अंदर की कुंडलिनी शक्ति को जागृत करती है। ज्योतिषीय गणना के अनुसार यह घटना कार्तिक तथा चैत्र मास की अमावस्या के 6 दिनों के उपरांत आता है। षष्ठी के दिन डूबते हुए सूर्य और सप्तमी के दिन उगते हुए सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है। डूबते हुए सूर्य को गंगा जल के साथ और उगते सूर्य को गाय के दूध से अर्ध्य देने का प्रचलन है। असल में छठ पर्व प्रकृति की पूजा है। इसके पूजन के केंद्र में सूर्य देव हैं।

खबरें और भी हैं...