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भास्कर खास:खेत में ही सड़ गया मक्का, अनाज सुखाने की जगह नहीं, 2 साल पुराना रेट भी किसानों को नहीं मिल रहा

मधेपुराएक महीने पहले
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सहरसा में यास तूफान के दौरान हुई बारिश 
में मक्के की फसल डूबकर नष्ट हो गई। - Dainik Bhaskar
सहरसा में यास तूफान के दौरान हुई बारिश में मक्के की फसल डूबकर नष्ट हो गई।

मक्के की खेती कोसी व सीमांचल के किसानों की जीवन रेखा है। इस इलाके में बड़े पैमाने पर मक्के की खेती है। इसलिए इस क्षेत्र को मक्के का कटोरा कहते हैं। लेकिन इन दिनों में मक्का की खेती करना किसानाें के लिए घाटे का सौदा बनते जा रही है। इस बार जहां कोरोना की वजह से लॉकडाउन लग गया और अधिकांश मक्का का निर्यात नहीं किया जा सका। दूसरी ओर प्राकृतिक आपदा यास तूफान और मानसूनी बारिश ने खेत और खलिहान में ही अनाज काे सड़ा दिया। किसानों को अंकुरित अनाज को सुखाने की जगह तक नहीं मिल रही है।

खगड़िया में सर्वाधिक 1 लाख 60 हजार हेक्टेयर में मक्के की खेती होती है। सूत्रों के मुताबकि यहां 50 से 60 प्रतिशत तक मक्के का नुकसान हुआ है। कटिहार में 38 हजार हेक्टेयर, पूर्णिया में 37 हजार हेक्टेयर, मधेपुरा में 35 हजार हेक्टेयर, सहरसा में 24 हेक्टेयर में रबी मक्के की खेती होती है। एक आकलन के मुताबिक यहां भी यास तूफान और बारिश से करीब 20 से 25 प्रतिशत मक्के का नुकसान हो गया है। सरकारी तौर पर भी यास से हुए फसलों के नुकसान का आकलन कराया जा रहा है।

इधर, कोरोना के प्रभाव की वजह से इस बार दो साल पहले मिलने वाला रेट प्रति क्विंटल 22 से 24 हजार का इस बार आधे से कम मिल रहा है। ग्रामीण क्षेत्रों में तो 1000 रुपए क्विंटल पर मक्का बिक रहा है। मक्के के उत्पादन के कुल खर्च को देखें तो प्रति बीघा औसत खर्च 25000 का आता है। जबकि औसत पैदावार प्रति बीघा 90 मन की होती है। इस समय 1200-1300 रुपए क्विंटल का बाजार दर है, तो एक बीघा मक्का बेचने पर किसान के हाथ 43 हजार आएंगे। खर्चा काटकर महज 15000-17000 रुपए। यदि किसी ने लीज पर ले खेती की है, तो अंदाजा लगा सकते हैं कि किसानों के हाथ में क्या आएगा। इसी वजह से किसान महाजनों को ऋण चुकाने में ही सारी कमाई लगा दे रहे हैं।

मक्का का न्यूनतम समर्थन मूल्य 1825 रुपए निर्धारित है, लेकिन किसान आधी कीमत पर ही फसल बेचने को हो रहे मजबूर

मधेपुरा में तीनों सीजन में मक्के की खेती होती है 2.80 लाख एमटी लक्ष्य
मधेपुरा मेंं मक्का की खेती तीनों सीजन में होती है। लेकिन सबसे अधिक रबी के सीजन में 35000 हेक्टेयर में इसकी खेती होती है। इसी समय सर्वाधिक 2.80 लाख एमटी मक्का का उत्पादन होता है। इसके अलावा गरमा में 23500 हेक्टेयर में खेती की गई, जिसमें 1.50 लाख एमटी मक्का का उत्पादन हुआ। जिले के आलमनगर, चौसा, पुरैनी, उदाकिशुनगंज, बिहारीगंज, ग्वालपाड़ा, कुमारखंड, शंकरपुर, मुरलीगंज के इलाके में मक्का की खेती अधिक होती है। इसमें आलमनगर और चौसा प्रखंड क्षेत्र में मक्का ही किसानों की जीवन का आधार है। लेकिन पिछले दो साल से किसानों को मक्का की खेती में फायदा नहीं हो रहा है।

पूर्णिया जिले में 57 हजार हेक्टेयर में खेती, 517560 एमटी उत्पादन का अनुमान
मक्का पूर्णिया जिले के किसानों के लिए प्रमुख नकदी फसल मानी जा रही है। कृषि विभाग से प्राप्त जानकारी के अनुसार जिले में 57हजार हेक्टेयर में मक्का की खेती होती है। जिसमें 517560 एमटी मक्का के फसल उत्पादन का अनुमान लगाया गया है। इस साल यास चक्रवात के कारण से मक्का की फसल को नुकसान पहुंचा है। वहीं पूर्णिया में उत्तर बिहार का सबसे बड़ी अनाज मंडी गुलाबबाग है। मंडी में मक्का के फसल की कीमत ग्रेड पर निर्धारित होती है। जिले के ग्रामीण इलाकों में अच्छे क्वालिटी का मक्का 1250 रुपए और मंडी में 1360 से 1370 रुपए प्रति क्विंटल के हिसाब से बिक रहा है।

कटिहार में 48 लाख 45 हजार रुपए का हुआ नुकसान
कटिहार में रबी सीजन में 37.5 हजार हेक्टेयर में मक्का की खेती होती है। इस बार कोरोना को लेकर लागू लॉकडाउन व फिर यास चक्रवात ने किसानों की परेशानी चरम पर पहुंचा दिया। लॉकडाउन के वक्त किसानों को मंडी तक मक्का की तैयार फसल पहुंचाने में काफी मशक्कत करनी पड़ी। किसानों का कहना है कि इस बार मक्का बेचकर लागत तक नहीं मिल पा रही है। जिला कृषि विभाग की रिपोर्ट में जिले में यास तूफान से 11 हजार हेक्टेयर में लगी धान, मक्का, मूंग आदि की फसल बर्बाद हुई है। जिससे किसानों को लगभग 48 लाख 45 हजार रुपए का नुकसान हुआ है।

खगड़िया में खेत से लेकर खलिहान तक के अनाज में अंकुरण
खगड़िया एशिया में सबसे ज्यादा मक्का का उत्पादन करने वाला जिला है। यहां चौथम, अलौली, मानसी, बेलदौर, खगड़िया और परबत्ता के 1 लाख 60 हजार हेक्टेयर जमीन में मक्का की खेती होती है। यहां से वर्ष 2020 में 62 रैक मक्का निर्यात किया गया था। जिसमंे से 30 रैक मानसी और 30 खगड़िया से भेजा जाता है। 2 रैक मक्का ट्रक से भेजा जाता है। एक रैक में 40 हजार बोरियां रहती हैं। प्रत्येक वर्ष 14 लाख 88 हजार क्विंटल मक्का यहां से बाहर भेजा जाता है। लेकिन इस बार लॉकडाउन, यास तूफान और मानसूनी बारिश ने खेत से लेकर खलियान की अनाज को अंकुरित कर दिया।

सुपौल: भंडारण में भी नमी से नुकसान
जिले में प्रतिकूल मौसम से किसानों के लिए मक्के की खेती घाटे का सौदा होते जा रही है। जिले में रबी के सीजन में 22000 हेक्टेयर में मक्के की खेती होती है। लगभग दो लाख एमटी मक्का का उत्पादन होता है। इस बार तूफानी बारिश ने करीब 20 फीसद फसल को नुकसान पहुंचा दिया है। जिससे किसानों को बेचने पर कम मूल्य मिल रहा है।

4 हजार हेक्टेयर की फसल नष्ट
सहरसा में इस बार लगभग 24 हजार हेक्टेयर भूमि में रबी मक्का की फसल लगाई गई थी। जिससे करीब 90 हजार मीट्रिक टन मक्का उत्पादन की उम्मीद थी। कृषि विभाग से प्राप्त जानकारी के अनुसार जिले में लगभग 4000 हेक्टेयर भूमि में लगी मक्का की फसल तूफान की वजह से नष्ट हो गई है।

अररिया में 43 हजार हेक्ट. में खेती
इस वर्ष अररिया जिले में कुल 43 हजार हेक्टेयर में मक्का की खेती की गई है। जिले में यास तूफान से मक्का की फसल को नुकसान हुआ है। अधिक बारिश होने की वजह से स्टोरेज मक्के में नमी आ गई। जिससे इसके दाम में अंतर आ गया है। पेट्रोलियम पदार्थ की कीमत में तेजी से किसानों का खर्च बढ़ गया।

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