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आयोजन:मानसिक स्वास्थ्य व्यक्ति के मन की उत्तम अवस्था है

मधेपुरा10 महीने पहले
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  • बीएनमएयू संवाद व्याख्यानमाला के तहत फेसबुक पेज पर ऑनलाइन व्याख्यान, बोलीं डॉ. इंदू...

बीएनएमयू संवाद व्याख्यानमाला के तहत मंगलवार को विवि के फेसबुक पेज पर व्याख्यान का आयोजन किया गया। 
 भारतीय दर्शन में मानसिक समस्याओं के समाधान विषय पर आयोजित व्याख्यान में हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल केंद्रीय विश्वविद्यालय श्रीनगर-गढ़वाल में दर्शनशास्त्र विभाग की अध्यक्ष निदेशक, एफडीसी (पीएमएमएमएनएमटी) डॉ. इंदू    पांडेय  ने अपना विचार रखा।  
   उन्होंने कहा कि मानसिक स्वास्थ्य व्यक्ति के मन की उत्तम अवस्था है। इसमें वह अपनी क्षमताओं को समझता है और अपने उद्देश्य के लिए उसका प्रयोग कर सकता है। जीवन के सामान्य दबाव एवं तनाव को अच्छे से संभाल सकता है। 
  वह सकारात्मकता एवं उत्पादकता के लिए कार्य कर सकता है। वह अपने घर- परिवार, समुदाय और राष्ट्र के लिए अपना योगदान कर सकता है। उन्होंने कहा कि भारतीय दर्शन के अनुसार मनुष्य का ज्ञान, व्यवहार एवं भावना तीनों स्तर पर संतुलन ही मानसिक स्वास्थ्य है। मानसिक स्वास्थ्य पर शारीरिक स्वास्थ्य का भी प्रभाव पड़ता है। मानसिक स्वास्थ्य का प्रभाव व्यक्ति की दिनचर्या, उसके संबंध और शारीरिक स्वास्थ्य पर पड़ना निश्चित है। उन्होंने कहा कि भारतीय दर्शन में पंचकोश की अवधारणा है। 
  ये हैं अन्यमय कोष, प्राणाय कोष, मनोमय कोष, विज्ञानमय कोष एवं आनंदमय कोष। इनमें प्रथम तीन कोष मानव व्यक्तित्व एवं मानसिक स्थितियों से संबंधित हैं और बाद के दो बौद्धिक एवं आध्यात्मिक क्षमता से संबंधित हैं। इन पांचों कोषों के केंद्र में मनोमय कोष है। उन्होंने कहा कि शारीरिक स्वास्थ्य भी मानसिक स्वास्थ्य पर निर्भर करता है। ऐसा नहीं है कि हम मन के द्वारा शरीर के कष्ट को दूर कर सकते हैं, लेकिन शरीर कष्ट की अनुभूति पर नियंत्रण अवश्य किया जा सकता है। 
कोरोना संक्रमण से समाज में है भय, भूख और भ्रम का माहौल
इंदू ने कहा कि भारतीय दर्शन में मानसिक स्वास्थ्य के लिए तीन शर्तें बताई गई हैं। जो विवेकशीलता यानी सम्यक विवेक, चित्त की स्थिरता और स्थितप्रज्ञा यानी बुद्धि की स्थिरता। यदि ये तीनों हैं, तो आप मानसिक रूप से स्वस्थ हैं। उन्होंने कहा कि कोरोना संक्रमण के कारण समाज में भय, भूख एवं भ्रम का वातावरण है। हमारे अंदर असुरक्षा बोध बढ़ा है। सामाजिक मेल-मिलाप की संस्कृति खत्म हो रही है। व्यवहार असंतुलित हो गया है। रोजगार के अवसर कम हो गए हैं। काम करने के विकल्प काफी कम हो गए हैं। उन्होंने कहा कि भारतीय दर्शन निराशावादी एवं पलायनवादी नहीं है। इससे हम न केवल आध्यात्मिक लक्ष्यों को प्राप्त कर सकते हैं, बल्कि व्यावहारिक जीवन एवं जगत को भी स्वस्थ एवं सुंदर बना सकते हैं। उन्होंने कहा कि भारतीय दर्शन में सभी प्रकार के दुखों से मुक्ति के उपाय बताए गए हैं। भारतीय दर्शन में निहित मूल्यों को अपनाकर हम स्वयं भी दुखों से मुक्त हो सकते हैं और समाज को भी दुखों से मुक्ति दिला सकते हैं। हमें मानसिक स्वास्थ्य के लिए अपने मन को नकारात्मकता से हटाकर सकारात्मकता की ओर ले जाना होगा।

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