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आस्था:प्रतिमा विसर्जन में कम लोगों को शामिल करने को छह फीट छोटी बन रही है मूर्ति

मधेपुरा8 दिन पहले
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शनिवार को बड़ी दुर्गा स्थान में स्थापित कलश।
  • जिले के विभिन्न दुर्गा मंदिरों में शुरू हो गई नवरात्र की पूजा
  • 119 वर्ष पुराने बंगला दुर्गा मंदिर में पहले बनती थी 10-12 फीट की प्रतिमा

जिले में शनिवार से नवरात्र शुरू हो गया। इसके साथ ही दुर्गा मंदिरों में भक्तों की चहल-पहल भी शुरू हो गई। जिला मुख्यालय में भी चार स्थानों पर शनिवार से दुर्गा पूजा शुरू हुई। हालांकि कोरोना को लेकर जारी गाइडलाइन से पूजा के उत्सव का सार्वजनिक माहौल तो नहीं बन पाया, लेकिन पूजा के उत्साह में कोई कमी नहीं रही। सुबह से ही लोग मां दुर्गा की पूजा-पाठ में लीन हो गए। विसर्जन में कम लोगों के शामिल होने को देखते हुए इस बार विभिन्न जगहों पर प्रतिमा की ऊंचाई भी कम कर दी गई है। ज्यादातर श्रद्धलुअों को सिर्फ घरों में ही पूजा पाठ करते देखा गया। जिला मुख्यालय के 119 साल पुराने बंगला दुर्गा मंदिर की ओर से हर साल बजने वाले प्रसिद्ध ढाक के थाप की आवाज का लोगों को अगले साल का इंतजार करना होगा। काेरोना गाइडलाइन के अनुसार ही दुर्गा पूजा का आयोजन होगा। हालांकि आयोजकों का कहना है कि कोरोना पर भक्ति हावी रहेगी। भले ही सार्वजनिक रूप से आयोजन थोड़ा फीका रहेगा लेकिन भक्ति भाव में कहीं से कमी नहीं रहेगी। आयोजक इंद्रनील घोष का कहना है कि एेसा पहली बार हुआ है कि हम लोग सीमित व्यवस्था के तहत कार्य कर रहे हैं। जबकि दुर्गा पूजा को लेकर एक माह पूर्व से तैयारी में जुट जाते थे। इस तैयारी में केवल हम लोग ही नहीं, बाजार के सभी व्यवसायी स्वेच्छा से इस काम को अंजाम देते थे। उन्होंने बताया कि 1901 में स्थापित इस दुर्गा स्थान के संस्थापक डॉ. सतीशचंद्र घोष ने अपने सहयोगी के साथ मिलकर सहरसा के धबौली व साहुगढ़ में एक साथ शुरू किया था।

श्रद्धालुओं को नहीं मिलेगा महाप्रसाद
बंगला दुर्गा मंदिर का महाप्रसाद भी अपने आप में विख्यात है। कई लोग सिर्फ महाप्रसाद ग्रहण करने के लिए एक बार जरूर आते हैं। लेकिन इस बार श्रद्धालुओं को प्रसाद भी नहीं मिलेगा। आयोजन समिति के सदस्य प्रवीर बनर्जी कहते हैं कि महाप्रसाद में समुद्र, कुआं, गंगा व कोसी के पानी का संमिश्रण होता है। मान्यता है कि इस प्रसाद को ग्रहण करने से कई तरह की मन्नतें पूरी होती हैं।

इस बार बिना किसी थीम के होगा आयोजन : इंद्रनील
आयोजक इंद्रनील घोष बताते हैं कि हर बार दुर्गा पूजा की एक थीम होती थी। जिस पर हमलोग काम करते थे। शहर के एक मात्र दुर्गा स्थान जिसे सबसे ज्यादा जगह होने के कारण लोग दर्शन के साथ-साथ सांस्कृतिक व सामाजिक धरोहर को अपने आप में समेटे यहां जुटते थे। मंदिर व मूर्ति पर बंगला लुक अपने आप में बहुआयामी संस्कृति को दर्शाता था। लेकिन इस बार यह सब सरकार की गाइडलाइन के अनुसार नहीं दिखेगा। आयोजक सरकार की गाइडलाइन को सर्वोपरि मानते हैं लेकिन अंदर की टीस भी निकल जाती है। वे कहते हैं कि रैली और चुनाव हो सकते हैं। लेकिन मेला पंडाल और लाउडस्पीकर नहीं बजना, समझ से परे है।

शनिवार को मास्क लगाकर पूजा-अर्चना करते श्रद्धालु।
शनिवार को मास्क लगाकर पूजा-अर्चना करते श्रद्धालु।

मूर्ति की ऊंचाई में भी किया गया बदलाव
विशाल व आकर्षक मूर्ति के लिए चर्चित बंगला दुर्गा मंदिर में इस बार मूर्ति के ऊंचाई में भी बदलाव किया गया है। पहले जहां 10 से 12 फीट की मूर्ति होती थी, वहीं इस बार 5 से 6 फीट की मूर्ति बन रही है। आयोजक ने बताया कि इसका कारण सरकार की गाइडलाइन में मूर्ति विर्सजन में भी कम लोगों का होना है। उन्होंने बताया कि मूर्ति की इतना साइज रहेगी कि उसे चार से पांच लोग ही उठा सकें।

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