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अच्छी पहल:जीरो टिलेज से खेती कर किसान बचा रहे हैं 40 से 50 प्रतिशत खर्च, हाेगी अच्छी उपज

मधुबनी7 महीने पहले
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जिले में बारिश नहीं होने के कारण किसान अपनी खेती करने में पिछड़ जाते थे। अक्सर किसानों की ओर से यह सुनने को मिलता था कि बारिश पहले हो गर्ई। बिचरा तैयार है लेकिन पानी नहीं होने के कारण धानो की रोपाई नहीं हो पा रहीं हैं। ऐसे किसान कृषि यांत्रिक मशीन से तकनीकी रूप से अपने खेतों को खेतों में पानी नहीं रहने पर भी अपने खेतों को आबाद कर सकते हैं। उक्त बात जानकारी जिला कृषि विज्ञान केन्द्र सुखैत झंझारपुर के डा. सर्वेश कुमार गुप्ता ने दी।

उन्होंने बताया कि जल जीवन, हरयाली मिशन व जलवायु आधारित खेती के लिए 500 एकड़ का लक्ष्य मिला था। मिले लक्ष्य के तहत धान की सीधी बुआई पद्धति से 270 एकड़ खेतों को आबाद किया गया है। वही ऐसे किसान जिनके खेती में पानी काफी कम है। वह ड्रमसीडर यंत्र से अपने खेतों को आसानी से आबाद कर रहे हैं। इस तकनीक को अपना कर किसान पानी नहीं होने, पानी कम होने आदि कारणों से खेती में पिछड़ने से निजात पा सकते है।

पैडी ट्रांसप्लांट, जीरो टिलेज व ड्रमसीडर आदि कृषि यंत्र से बारिश पूर्व अपनी खेतों को आबाद करने वाले कुशल कृषक में पण्डौल प्रखण्ड के बिरौल गांव निवासी कपिल देव झा उर्फ मुरारी, राजनगर प्रखण्ड के भटसिममर गांव निवासी आशुतोष ठाकुर, कलुआही प्रखण्ड के कपड़िया गांव निवासी अशोक कुमार सिंह आदि शामिल है। ये किसान बीते 6 सालों से यांत्रिक मशीन से तकनीकी खेती कर रहे हैं। जिले को इस बार कुल 1 लाख 44 हजार हेक्टेयर में धान की खेती करने का लक्ष्य मिला है।

इसके लिए तकरीबन जिले में 6 लाख रजिस्टर्ड किसान है। तो बहुत ऐसे किसान भी है जिनका रजिस्ट्रेशन नहीं हुआ है। लेकिन वे धान की खेती करते हैं। उक्त बात जानकारी जिला जिला कृषि पदाधिकारी सुधीर कुमार ने दी। यदि लक्ष्य के अनुरूप खेती होती हैं तो जिले में इस वर्ष रिकार्ड तोड़ उपजा होने की संभावना है। क्योंकि समय अभी खेती के लिए उपयुक्त चल रहा है। यही कारण है कि जिले में तकरीबन 35 से 40 प्रतिशत धान की रोपनी हो चुकी है ।

जिले में 1 लाख 44 हजार हेक्टेयर में धान की खेती करने का लक्ष्य

किसान ऐसे करें जीरो टिलेज से खेती  
कृषि वैज्ञानिक केन्द्र सुखैत के सर्वेश कुमार गुप्ता ने बताया कि बुआई के समय यह ध्यान रहे की खेतों में पर्याप्त नमी है की नहीं ।क्योंकि सीधी बुआई के समय खेतों में नमी होनी चाहिए। बुआई से पुर्व धान के बीजों का उपचार अति आवश्यक है। बीज को 8 से 10 घंटे पानी में भिगोकर, उसमें से निकले खराब बीज को छानकर बाहर कर दे। इसके बाद 1 किलो बीज़ की मात्रा के लिए 0.2 ग्राम सटेप्टो साईकलीन के साथ दो ग्राम काबैडाजिम सहित बीज को दो घंटे छायादार जगह पर सुखा दे। इसके बाद मशीन के द्वारा सीधे बुआई करें। इस तकनीक से खेती करने पर मोटे बीज,30 से 35 किलो, मध्यम बीज़ 25 से 30 व छोटे महीन धान की बीज 20 से 25 किलो प्रति हेक्टेयर प्रयाप्त होती है।
इस पद्धति से खेती करने पर 40 से 50 प्रतिशत खर्च की होती हैं बचत  

बिरौल गांव निवासी कृषक कपिल देव झा ने बताया कि हम लगातार इस तकनीक से खेती करते आ रहे हैं । इसमें रोपाई व जुताई की लागत मे बचत होती हैं ।साधारण तरीके से घान की रोपाई में प्रति एकड़ 6हजार  व जुताई में 2 हजार व अन्य खर्च को जोड़ दे तो तकरीबन 10 हजार की लागत आती हैं । लेकिन सीघी बुआई तकनीकी से खेती कर जुताई व रोपाई का खर्च बच जाता है। जीरो टिलेज से खेती करने के समय केवल इस बात का ध्यान रखना होता है कि मशीन ठीक से सेट हुआ की नहीं। ताकि बीज व उर्वरक सही गहराई में पड़े।

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