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दुर्भाग्यपूर्ण:चुनचुन बाबू की प्रतिमा नहीं लगना दुर्भाग्यपूर्ण है

मधुबनी2 महीने पहले
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सांस्कृतिक संस्था मैथिल समाज रहिका की ओर से घोषणा के बावजूद स्थानीय विद्यापति चौक पर मिथिला मैथिली के वरिष्ठ व प्रखर आंदोलनकारी चुनचुन बाबू की मुर्ति की स्थापना नहीं किया जाना दुर्भाग्यपूर्ण है। विदित हो कि बाबू चुनचुन मिश्र ने दिल्ली से लेकर मिथिला क्षेत्र के विभिन्न स्थानों पर किए गये अपने विभिन्न आंदोलनों के दम पर मिथिला-मैथिली के प्रतिष्ठत आंदोलन को सालों तक जीवंत रखा उनके ही द्वारा किए गये आंदोलन के फलस्वरूप आज मातृभाषा मैथिली ने अपने संवैधानिक अधिकार को प्राप्त करने की दिशा में समुचित कदम उठाया। मिथिला-मैथिली आंदोलन के वट वृक्ष के रुप में विख्यात बाबू चुनचुन मिश्र का नाम किसी से छिपा नहीं है। इस बाबत बताते हुए मिथिला-मैथिली सेनानी मनोज झा ने बताया कि आंदोलन को बल देने के उद्देश्य से मैथिल समाज रहिका की स्थापना बाबू चुनचुन मिश्र ने ही की थी और वे इस संस्था के संस्थापक अध्यक्ष भी थे।

उनके कुशल नेतृत्व में इस संस्था ने सांस्कृतिक रुप से कई किर्तिमान स्थापित किये। चाहे मिथिला के सांस्कृतिक विभूतियों को मंच पर सम्मानित किए जाने की बात हो या फिर उन विभूतियों के नाम से पुरस्कार बांटने की परंपरा सब उन्हीं की देन है जो आज तक अनवरत जारी है। उल्लेखनीय है कि बाबू चुनचुन मिश्र अंतरराष्ट्रीय मैथिली परिषद के अंतर्राष्ट्रीय अध्यक्ष थे और मिथिला राज्य आंदोलन को बल देने के उद्देश्य से उनके ही मार्गदर्शन व कुशल नेतृत्व में मिथिला राज्य संघर्ष समिति की स्थापना की गई थी और इन संस्थाओं ने हमेशा आंदोलन को बल दिया। ऐसी परिस्थिति में चुनचुन बाबू की प्रतिमा की स्थापना उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि मानी जाएगी और जिससे मैथिल समाज रहिका की प्रतिष्ठा और बढ़ेगी।

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