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अच्छी खबर:अब भाइयों की कलाई पर बंधेगी सिक्की घास की राखियां

मधुबनी10 महीने पहले
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  • पर्यावरण की रक्षा के साथ लाेगाें काे मिला काम; लोककला-पर्यावरण की रक्षा को लेकर एक नई पहल

लाेककला काे प्रोत्साहित करने व पर्यावरण की रक्षा को लेकर अब जिले में घास की बनी राखियां भाईयों के कलाई पर सजेगी। इस आइडिया को लेकर क्राफ्ट वाला के निदेशक राकेश झा ने बताया कि ये आज के वक्त की मांग है कि हम अपने दैनिक जीवन मे इकोफ्रेंडली बायोडिग्रेडेबल उत्पादों को शामिल करें। नहीं तो ऐसे ही कभी बाढ़ तो कभी सूखा तो कभी महामारियों के रूप में हमें प्रकृति के प्रकोप को झेलना होगा। ऐसे में ये जरूरी हो गया है कि हम पुनः प्रकृति के करीब होकर उसके संरक्षण और संवर्धन का प्रयास करें।

स्टार्टअप क्राफ्ट वाला ने इसी दिशा में लोक शिल्प सिक्की के शिल्पकारों के साथ मिल कर इस राखी त्योहार को इकोफ्रेंडली तरीके से मनाने का फैसला किया है। इस वर्ष बाजार में सिक्की घास से बनी राखियां ऑनलाइन के साथ-साथ स्थानीय बाजारों में भी मिलेगी। ये इकोफ्रेंडली राखियां पूर्णतः घास से बनी हुई है। जिस कारण ये मिट्टी में बैक्टीरिया या अन्य जीवित जीवों द्वारा स्वतः विघटित होने में सक्षम हैं। जिस कारण ये किसी तरह से पर्यावरण को नुकसान नहीं पहुंचाती है। राकेश झा ने बताया कि हाल ही में कोरोना से उत्पन्न संकट से जब बड़ी मात्रा में प्रवासी मजदूरों का आगमन बिहार व जिले में हुआ तो उनमें से महिलाओं को हमने ऐसे छोटे-छोटे उत्पाद को बनाने के लिए प्रोत्साहित किया जो वह पहले से ही बनाना जानते हैं।

सिक्की घास की राखी एक ऐसा ही उत्पाद है। मधुबनी, दरभंगा सहित उत्तर बिहार की महिलाएं पहले से ही सिक्की घास के विभिन्न दैनिक जीवन मे उपयोगी उत्पादों को बनाती आ रही थी। ऐसे में क्राफ्ट वाला के डिजाइनरों ने उन्हें मात्र बाजार के हिसाब से उत्पाद बनाने की ट्रेनिंग देकर राखी बनाने को लेकर प्रेरित किया। इससे कोरोना की आपदा से बेरोजगार हुए प्रवासी महिलाओं ने आर्थिक रूप से खुद को मजबूत करने की दिशा में कदम बढ़ाया दिया है। अब इन लोगों को देखकर गांव की अन्य महिलाएं भी इस कार्य की तरफ आकर्षित हुई है। 

कोविड-19 महामारी को लेकर आया आइडिया

क्राफ्टवाला के निदेशक राकेश झा ने बताया कि घास के बने राखियों को बाजार में उपलब्ध कराने का आइडिया उन्हें कोविड-19 जैसे महामारी से मिली है। क्योंकि इस महामारी के दौरान कई प्रवासी खासकर महिलाओं के सामने आर्थिक संकट खड़ा हो गया था। जब सिक्की के घास से बनी राखी के प्रोजेक्ट पर काम करने का सोचा तो उनके सामने एक बात बहुत स्पष्ट थी कि उनको अपने उत्पाद को स्थानीय शिल्पकारों के मदद से ही बनाना है और हमारे उत्पाद पूर्णतः पर्यावरण मित्र ही हो।

आज जब बाजार में इस उत्पादों के प्रति लोगों में आकर्षण दिखाई दे रहा है तो कहीं ना कहीं लगता है कि लोगों में अपने स्थानीय कारीगरों और प्रकृति से जुड़ाव अवश्य होगा और आगे से लोग इस तरह के उत्पादों को अपने दैनिक जीवन मे जरूर शामिल करेंगे जो पर्यावरण अनुकूल और स्थानीय स्तर पर रोजगार को बढ़ावा देता हो। एक दिन में 50 घास की राखी बना सकते हैं : एक शिल्पकार का ग्रुप भर दिन में मुश्किल से 50 पीस राखी बना ले रहा है जिसमे कच्चे माल की लागत तो नहीं के बराबर है क्योंकि ये घास उत्तर बिहार में प्राकृतिक रूप से मिलती है पर श्रमसाध्य कार्य होने के कारण इसमें समय बहुत लगता है। जिस कारण ये उत्पाद अन्य आर्टिफिशियल उत्पादों से थोड़े उच्च मूल्य पर बाजार में उपलब्ध होते हैं।

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