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भाई बहन के प्रेम का प्रतीक:सामा-चकेवा के गीतों से गुंजायमान हुआ वातावरण

मधुबनी3 दिन पहले
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सामा-चकेवा खेलती सहेलियां।
  • कार्तिक पूर्णिमा के दिन संपन्न हाेगा त्याेहार, गीत गाकर बहनें अपने भाईयों की दीर्घायु की कामना करती हैं

यूं तो मिथिलांचल में भाई बहन के प्रेम के प्रतीक कई त्योहार है लेकिन उनमें से सामा- चकेवा काफी महत्वपूर्ण है। मिथिलांचल अपनी लोक सांस्कृति, पर्व-त्योहार व पुनीत परंपरा के लिए प्रसिद्घ रहा है। इसी कड़ी में भाई-बहन के असीम स्नेह का प्रतीक लोक आस्था का पर्व सामा-चकेवा है। मिथिला की प्रसिद्घ संस्कृति व कला का एक अंग है सामा-चकेवा उत्सव।

आस्था का महापर्व छठ समाप्त होने के साथ ही भाई-बहनों के अटूट स्नेह व प्रेम का प्रतीक सामा-चकेवा पर्व की शुरुआत हो चुकी है। सामा-चकेवा की मूर्ति निर्माण में बालिका व नवयुवती पुरी तरह से लग गई। वर्तमान में सामा बनाने में कमी जरूर हुई है। लोग बना हुआ सामा ही खरीद रहे हैं। ग्रामीण क्षेत्रों का हर गली व मुहल्ला सामा-चकेवा के गीतों से गूंजित हो रहा है। मिथिलांचल में भाईयों के कल्याण के लिए बहना यह पर्व मनाती है।

इस पर्व की चर्चा पुरानों में भी है। सामा-चकेवा पर्व की समाप्ति कार्तिक पूर्णिमा के दिन होती है। सामा-चकेवा पर्व के दौरान बहनें सामा, चकेवा, चुगला, सतभईयां को चंगेरा में सजाकर पारंपरिक लोकगीतों के जरिये भाईयों के लिए मंगलकामना करती हैं। सामा-चकेवा का उत्सव पारंपरिक लोकगीतों से है। संध्याकाल में गाम के अधिकारी तोहे बड़का भैया हो, छाऊर छाऊर छाऊर, चुगला कोठी छाऊर भैया कोठी चाऊर व साम चके साम चके अबिह हे, जोतला खेत मे बैसिह हे से लेकर भैया जीअ हो युग युग जीअ हो आदि गीतों व जुमले से काफी मनोरंजन करते हैं।

यह दृश्य मिथिलांचल की मनमोहक पावन संस्कृति की याद ताजा कर देती है। कार्तिक शुक्ल पंचमी से प्रारंभ होकर पूर्णिमा तक यह पर्व मनाया जाता है। माहात्म्य से जुड़ी इस पर्व के संबंध में कई किस्से हैं। अलबत्ता जो भी हो मिथिलांचल में भी तेजी से हो रहे शहरीकरण के बावजूद यहां के लोग अपनी संस्कृति को अक्षुण्ण बनाए रखने में अभी कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं।

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