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एक-दूसरे को दी मुबारक:मुस्लिम समुदाय के लोगों ने घर मे रहकर बकरीद की अदा की नमाज, दी दुम्बा बकरे की कुर्बानी

मधुबनी7 दिन पहले
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  • लोगों ने दूर से ही एक-दूसरे को दी मुबारक : मस्जिद व ईदगाहों में 10 से अधिक लोगों पर कमेटी ने लगाई रोक
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कोविड-19 के कारण शहर सहित ग्रामीण इलाकों में भी मुस्लिम समुदाय के लोगों ने सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करते हुए अपने-अपने घरों में रहकर ईद उल अजहा अर्थात बकरीद की नमाज अदा किया। ईदगाह व मस्जिदों में भी 10 नमाजियों से अधिक पर मस्जिद व ईदगाह कमेटी की ओर से रोक लगा दी गई थी। वहीं इनके ओर से भी सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करते हुए नमाज अदा किया गया। नमाज अदा करने के बाद इब्राहिम अलैहीस सलाम के सुन्नत को याद करते हुए दुंम्बा बकरे की कुर्बानी दिया गया।

मो इनामुर रहमान ने बताया कि यह पर्व इस्‍लामिक कैलेंडर के अनुसार जीलहिज्ज महीना में मनाया जाता है। मुसलमान इस दिन नमाज अदा करने के बाद दुंम्बा बकरे की कुर्बानी देते हैं। यह पर्व अपनी सबसे प्रिय चीज को अल्‍लाह के लिए कुर्बान कर देने का होता है। लेकिन इस पर्व पर दुंम्बा बकरे की कुर्बानी देने से जुड़ी एक ऐतिहासिक घटना है। इस्लामिक मान्यताओं के अनुसार हजरत इब्राहिम अलैहिस्सलाम, अल्लाह का पैगंबर माना गया है। इब्राहिम अलैहिस्सलाम हमेशा सभी की भलाई के काम में जुटे रहे और उनका जीवन जनसेवा में ही बीता। उन्होंने खुदा की इबादत की और 80 साल उम्र के बाद उन्हें चांद-सा बेटा पैदा हुआ, जिसका नाम उन्होंने इस्माइल अलैहिस्सलाम रखा।

कोरोना के कारण ईदगाह में हर वर्ष की तरह नहीं थे नमाजी, साेशल डिस्टेंस के साथ पढ़ी गई नमाज

लॉक डाउन के कारण घरों में अदा की गई बकरीद की नमाज

सकरी पंडौल समेत जिले में बकरीद का त्योहार धूमधाम व शांति के साथ से मनाया गया। हालांकि लॉकडाउन और कोरोना का डर का असर देखा गया। लॉकडाउन के चलते इस बार मस्जिदों में कम नमाजियों को देखा गया। ज्यादातर लोग अपने घर से नमाज अदा किया। वहीं, सोशल डिस्टेंसिंग को मानते हुए कई लोग अपने परिजनों को बकरीद की शुभकामनाएं फोन से देते देखे गए। एक-दूसरे के घर आने जाने से भी बचते दिखे। कहा जाता है कि पहली ईद-उल-फित्र पैगम्बर मुहम्मद ने सन 624 ई. में जंग-ए-बदर के बाद मनायी थी। इस त्योहार के बाद ईद-उल-अजहा अर्थात बकरीद पर्व आता है। इसे ईद-ए-कुर्बानी भी कहा जाता है, क्योंकि इस दिन नियम से कुर्बानी दी जाती है। बकरीद के दिन दी जाने वाली कुर्बानी को सुन्नत-ए-इब्राहिम कहते हैं, क्योंकि इस त्योहार की शुरुआत हजरत इब्राहिम से हुई थी।

अपने प्रिय वस्तु को कुर्बान करने की रही है परंपरा

इब्राहिम अलैहिस्सलाम को एक दिन सपने में खुदा दिखे। जिन्होंने उन्हें आदेश दिया कि वह अपनी सबसे प्‍यारी चीज को कुर्बान कर दे। खुदा के आदेश का पालन करते हुए उन्‍होंने अपने सभी प्रिय जानवरों को एक-एक करके कुर्बान कर दिया। लेकिन फिर से उन्‍हें खुदा ने सपने में आकर उनकी सबसे प्रिय चीज कुर्बान करने के लिए कहा। तब उन्‍होंने अपने बेटे को कुर्बान करने का प्रण लिया। बेटे की कुर्बानी देने से पहले उन्‍होंने खुद की आंख पर पट्टी बांध ली, और बेटे की कुर्बानी दे दी।

ऐसा करने के बाद जब इब्राहिम ने आंख से पट्टी हटाई तो उन्होंने देखा कि उनका बेटा तो खेल रहा है। अल्‍लाह ने इब्राहिम अलैहिस्सलाम की निष्ठा नियत और ईमानदारी देख अल्लाह ने फरिश्तों को हुक्म दिया इब्राहिम अल्यहिस्सलाम की छुरी चाकू चलने से पहले उसके बेटे के स्‍थान पर दुंम्बा बकरा, रख दो और बेटे इस्माइल अलैहिस्सलाम को बाहर खींच लो। फरिश्तों के द्वारा इस्माइल अलैहिस्सलाम को बाहर खींच दुंम्बा बकरा की कुर्बानी इब्राहिम अल्यहिस्सलाम के हाथों कुर्बानी दिलवा दी। ऐसा माना जाता है कि तभी से इब्राहिम अलैहिस्सलाम की सुन्नत को याद करते हुए बकरीद के दिन नमाज अदा करने के बाद बकरे की कुर्बानी देने की परंपरा चली आ रही है।

ईद-उल-जुहा हर्षोल्लास के साथ मनाया, घरों में इबादत

प्रखंड में ईद-उल-जुहा हर्षोल्लास के साथ मनाया गया। बच्चों के चेहरे पर थोड़ा सा भी कोरोना का असर नहीं दिखा। क्या बच्चे, क्या बूढ़े और क्या नौजवान सभी के सभी ईद-उल-जुहा के जश्न में एक दूसरे को सोशल डिस्टेंस रखते हुए मिठाई खिलाकर बधाई दी। सबसे खास बात यह रहा की सोशल डिस्टेंसिंग का सभी ने पालन किया और बिना गला मिले ही एक दूसरे को बधाई दी। इस अवसर पर बच्चों के खुशी देखते ही बना गजब का उत्साह दिखा। सभी नए-नए पोशाक में थे। झंझारपुर के कन्हौली, चनौरागंज, पिपरौलिया, चीरकुटा और संग्राम में शांति और भाईचारा के साथ मनाया गया। ईद-उल-जुहा का इस्लाम धर्म में खास महत्व है। हजरत इब्राहिम की कुर्बानी की याद के तौर पर मनाया जाता है। सभी लोगों ने अपने अपने घरों में इवादत कर कोरोना से निजात पाने का अर्ज लगाया है। ईद-उल-जुहा इसलाम धर्म का दूसरा प्रमुख त्योहार है।

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