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शारदीय नवरात्र:अरेराज के जलपा भवानी मंदिर में दूर-दूर से आते हैं भक्त, कृष्ण पक्ष की नवमी को दीपोत्सव का है विधान

मोतिहारी12 दिन पहले
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  • पहले दिन क्षेत्र के विभिन्न मंदिरों में मां दुर्गा की पूजा विधि विधान के साथ शुरू हुई

नवरात्र के पहले दिन क्षेत्र के विभिन्न मंदिरों में मां दुर्गा की पूजा विधि विधान के साथ शुरू हुई। कोरोना काल को लेकर मंदिरों में भीड़ भाड़ का माहौल देखने को नहीं मिला है। अरेराज में बिहार के सुप्रसिद्ध सोमेश्वर नाथ महादेव मंदिर से पश्चिम दिशा में नगर पंचायत क्षेत्र के वार्ड संख्या पांच हरदिया गांव के अंत में अति प्राचीन जलपा भवानी का मंदिर है। जहां पड़ोसी देश नेपाल सहित देश-विदेश से लोग पूजा अर्चना करने आते हैं। हर वर्ष यहां लगने वाली भीड़ इस वर्ष नहीं है। लेकिन पूरे विधि विधान से इस वर्ष भी पूजा हो रही है।

मंदिर अति शांत इलाके में आम के बगीचे के बीच में अवस्थित है। जहांआज भी यहां नवरात्र में दूर-दूर से आए तंत्र साधक यहां साधना में भी लीन रहते हैं। मुख्य पुजारी सुरेंद्र मिश्र ने बताया कि माता का नवरात्र के पूर्व भी प्रतिदिन रात्रि में भव्य श्रृंगार किया जाता है। प्रत्येक माह के कृष्ण पक्ष की नवमी को यहां दीपोत्सव कार्यक्रम का आयोजन किया जाता है। यह परंपरा अति प्राचिन है। दीपोस्व के दौरान जिनकी मन्नत पूरी होती है वह लोग भी आकर दीप जला कर माता का आभार प्रकट करते हैं।  यहां आने वाले भक्तों का मानना है। कि सच्चे मन से जो भी मन्नतें मांगी जाती है। माता रानी उसे जरूर पूरा करती है। मंदिर परिसर में नौ दिनों तक चलने वाले नवरात्र को लेकर दर्जनों की संख्या में साधक पहुंचकर साधना करते हैं। मां की उपासना करते हैं। साथ ही आसपास सहित दूर-दूर से लोगों का खासकर नवरात्र में यहां पूजा के लिए आना होता है। जलपा भवानी का मंदिर अति प्राचीन मंदिर है। सिद्धपीठ के नाम से जाना जाने वाला जालपा भवानी मंदिर में नवरात्र को लेकर बड़ी संख्या में लोगों की तादाद पहुंचती है।

पतली बौद्ध कालीन ईटों से बना है मंदिर
पूजा समिति के सदस्य सुरेश नारायण पांडेय ने बताया कि यह अति प्राचीन मंदिर है। इसका निर्माण कब हुआ या किसने बनवाया यह किसी को पता नहीं है। लेकिन सोमेश्वर नाथ मंदिर, भौरव बाबा मंदिर व जलपा भवानी माई का मंदिर पूर्वजों के अनुसार एक ही समय में बना है। जलपा मंदिर में बौद्ध कालीन पतली ईंटों का उस्तेमाल किया गया है। जिससे अनुमान लगाया जाता है कि बौद्ध काल में मंदिर का जीर्णोंद्धार कराया गया होगा।

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