शारदीय नवरात्र:अंधकार से प्रकाश की ओर जाने का भाव है झिझिया: सुशील

मोतिहारी2 महीने पहले
  • कॉपी लिंक

शारदीय नवरात्र में झिझिया प्रचलित है। यह अंधकार से प्रकाश की ओर जाने की प्रेरणा देती है। वेद विद्यालय के प्राचार्य सुशील कुमार पांडेय ने बताया कि दुर्गा सप्तशती के अध्ययन के आधार पर प्राचीन काल में गांव की स्त्रियां नौ की संख्या में नवदुर्गा के रूप में वस्त्राभूषण पहन कर हाथ में दुर्गा के खप्पर या ज्योति पात्र को लेकर गांव की सीमा का चक्कर लगाती थीं। वहीं झिलमिल झिलमिल शब्द कालांतर में झिझिया के रूप में प्रचलित हो गया। झिझियां की परंपरा तमसो मा ज्योतिर्गमय अर्थात अंधकार से प्रकाश की ओर जाने की प्रेरणा देती है।

चूंकि वैदिक संस्कार एवं वैदिक साहित्य का प्रभाव सम्पूर्ण भारतवर्ष के क्षेत्रों के साथ बिहार पर भी पड़ा, अतः झिझिया की परंपरा आज भी सूबे एवं कुछ अन्य क्षेत्रों में देखने को मिलती है। इसका तात्पर्य यह है कि छिद्र युक्त घड़े में रखे हुए दीपक के ज्योति पुंज के माध्यम से महिलाएं दुर्गा का रूप धारण कर राक्षसियों को मानो खोज-खोज कर गांव की सीमा से बाहर कर देती है। इधर पुरुष वर्ग नवरात्र में शक्ति की उपासना से परिवार, समाज एवं गांव के लिए अहित करने वाले पदार्थों को नष्ट करता है। यही है तमसो मा ज्योतिर्गमय का भाव, जो झिझियां के रूप में आज भी समाज में प्रचलित है।

खबरें और भी हैं...