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नहीं रहीं मृदुला:राजनीति व साहित्य के क्षेत्र में मृदुला सिन्हा ने बुलंदियों की सवारी की, लेकिन सांस्कृतिक जड़ों की जमीन कभी न छोड़ी

मुजफ्फरपुर11 दिन पहले
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यही आत्मीयता थी उनकी पहचान : शहर की गन्नीपुर में अपनी एक परिजन के साथ।
  • लोगों ने कहा- डॉ. मृदुला सिन्हा का निधन उत्तर बिहार के पूरे अंचल में सांस्कृतिक रिक्तता पैदा कर गया
  • राज्यपाल रहते हुए भी वे सार्वजनिक मंचों से सामा चकेवा का गीत गाना कभी नहीं भूलीं

(प्रशांत कुमार) लोकसंस्कृति के महापर्व छठ से ठीक पहले लोक संस्कृति की प्रमुख हस्ताक्षर रही डॉ. मृदुला सिन्हा का चले जाना उत्तर बिहार के पूरे अंचल में सांस्कृतिक रिक्तता पैदा कर गया है। गोवा की राज्यपाल रहते हुए भी वे सार्वजनिक मंचों से सामा चकेवा का गीत गाना कभी नहीं भूलीं।

मिथिलांचल और बज्जिकांचल की लोक संस्कृति को राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित करने में वे एक प्रमुख हस्ताक्षर के रूप में याद की जाएंगी। राजनीति से लेकर साहित्य के क्षेत्र में उन्होंने बुलंदियों की सवारी की। लेकिन, अपनी सांस्कृतिक जड़ों की जमीन कभी नहीं छोड़ी।

डॉ. मृदुला सिन्हा से जुड़ीं आरबीबीएम कॉलेज की प्राचार्य डॉ. ममता रानी ने बताया कि उन्हें आंचलिक शब्दों से लेकर ग्रामीण लोकोक्तियां, कहावतों और संस्कृति से लेकर लोक कलाओं से गहरा लगाव था। कई बार उन्होंने सार्वजनिक मंचों से “कौन भैया चलले अहरिया, कौन बिहिनी देलन आशीष हो ना...., जीअहू रे मेरो भैया जीओ भैया लाख बरिशे हो ना....’ जैसे गीत गाकर अपने तीज-त्योहार, रीति-रिवाज, जीवन मूल्य से लेकर नाते-रिश्तों तक के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को दुहराया है।

वहीं साहित्यकार डॉ. पूनम सिंह बताती हैं कि वे लोक आस्था को जीने वाली साहित्यकार थीं। लोक कंठों में समाए हुए लोकगीत को हमेशा उन्होंने अपना स्वर दिया है। वे लोक परंपरा को जीने वाली साहित्यकार रही हैं। उनकी कहानियों जैसे मात्र देह नहीं है औरत, एक दीये की दीवाली जैसी कहानी में वे भी लोक और परंपरा के महत्व को स्थापित करती हैं। विरासत और परंपरा उनकी लेखनी के प्राण तत्व रहे हैं।

वे अक्सर कहा करती थीं कि संग चले जब तीन पीढ़ियां, चढ़ें विकास की सभी सीढ़ियां। वे मौजूदा स्त्री विमर्श को अच्छा नहीं मानती थी। उनका मानना था कि स्त्री पहले से ही दाता की भूमिका में रही है। वह आदिशक्ति की प्रतीक है। वह किसी से याचना नहीं करेगी बल्कि देगी। उनके उपन्यास सीता पुनि बोलीं, घरवास, ज्यों मेंहदी के रंग, ढाई बीघा जमीन में भी उन्होंने अपनी इसी विरासत और परंपरा को स्थापित किया है।

डॉ. मृदुला के लिए शहर था मायका, अक्सर कहती थीं बुलावे का है इंतजार

डॉ. मुदुला सिन्हा शहर को अपना मायका समझती थीं। अक्सर मंचों से वे कहा करती थी कि लोग उन्हें मना करते हैं कि एक राज्यपाल के रूप में कार्यक्रमों में नहीं जाना चाहिए। इस पर उनका जवाब होता था कि वे तो रास्ता देखती रहतीं हैं चाहे कोई बुलाए या नहीं। वे सीधे अपने मायके आंगन में चली आती हैं।

बीआरएबीयू के दीक्षांत समारोह में उन्होंने बतौर विशिष्ट अतिथि शिरकत की। वहीं एलएस कॉलेज से लेकर सीनेट हॉल और शहर में होने वाले कार्यक्रमों में वे उपस्थित होती थी। उनके निधन से साहित्यकारों, शिक्षकों, राजनेताओं से लेकर समाज के सभी वर्गों के लोग में शोक की लहर दौड़ गई है।

शोक संवेदना जाहिर करने वालों में डॉ. सतीश कुमार राय, डॉ. पूनम सिंह, डॉ. तारण राय, डॉ. ममता रानी, डॉ. ओपी राय, डॉ. ओमप्रकाश सिंह, डॉ. प्रमोद कुमार, डॉ. रमेश गुप्ता, डॉ. कौशल किशोर चौधरी, डॉ. वीरेंद्र चौधरी, डॉ. सतीश कुमार, शशिकांत झा, महंत राजीव रंजन, शेखर कुमार, पूर्व विधायक बेबी कुमारी शामिल हैं।

डॉ. मृदुला सिन्हा को लेकर नवरत्नों की राय

  • डॉ. मृदुला सिन्हा अभिभावक तुल्य थीं। उनके निर्देश पर ही नवरत्न ने इस शहर में कार्य किया। कलमबाग चौक पर उनकी पहल पर ही चिल्ड्रेंस पार्क खुला। उनका सपना था कि शहर में स्वच्छता हो, पार्क हो। -सुरेश कुमार शर्मा, पूर्व नगर विधायक
  • स्वच्छता पर उनका एक ही संदेश था अपने हाथ पर काबू पाएं, गंदगी को दूर भगाएं। डॉ. मृदुला सिन्हा अपने स्वरचित पंक्तियों से लोगों को जागरूक करती थी। उनका मानना था कि स्कूली बच्चों में स्वच्छता का संस्कार भरा जाए। -डॉ. तारण राय
  • 5 वर्ष तक नवरत्न की संयोजिका के रूप में स्वच्छता पर अपने दायित्वों का निर्वहन किया। आज शहर में स्वच्छता को लेकर जो चर्चा हो रही है तो इसका श्रेय गोवा की पूर्व राज्यपाल डॉ मृदुला सिन्हा को ही जाता है। -डॉ. शालिनी कुमारी

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