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बच्चों की सेहत:जिले में पिछले वर्ष 3 वर्ष तक के करीब 1.84 लाख बच्चे नहीं देख सके स्कूल का मुंह,इससे सीखने-समझने की दक्षता भी कम होगी

मुजफ्फरपुरएक महीने पहलेलेखक: प्रशांत कुमार
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  • तन-मन-धन-जन ही नहीं बचपन पर भी भारी पड़ रहा कोरोना संकट, इसलिए इनकी देख-भाल की है विशेष जरूरत

कोरोना ने जो कुछ भी छीना है, उसकी भरपाई संभव नहीं है। इनमें से कुछ नजर आती हैं तो कुछ नहीं। उन्हीं में एक है कि जिले में करीब 1.84 लाख बच्चे, जो तीन वर्ष के होने के बाद भी स्कूल का मुंह तक नहीं देख पाए। मनोचिकित्सक और शिक्षाविदों का कहना है कि जब बच्चा पहली बार स्कूल जाता है, तो वह माहौल और दूसरे बच्चों से भी बहुत कुछ सीखता है।

ऐसे बच्चों को स्कूल का वातावरण नहीं मिलने से सीखने की क्षमता पर असर पड़ रहा है। प्री-प्राइमरी के लिए आंगनबाड़ी केंद्रों में 3 वर्ष तक के नामांकित लगभग 1.70 लाख बच्चे हैं। इंडियन एसोसिएशन ऑफ स्कूल्स के आंकड़ों के अनुसार, प्राइवेट स्कूलों में तीन वर्ष तक के करीब 14 हजार बच्चे नामांकित हैं।

मनोचिकित्सक : एक-दूसरे से सीखते हैं बच्चे

बच्चे को बार-बार अभ्यास कराएं, तो उसके दिमाग में वह चीज अच्छे से बैठती है। सीखने-सिखाने का ऑनलाइन तरीका छोटे बच्चों के लिए कारगर नहीं है। वे स्कूल के माहौल व दूसरे बच्चों को देख भी सीखते हैं। स्कूल बंद होने से साइकोलॉजिकल डेवलपमेंट भी प्रभावित होता है। - डॉ. अमर कुमार झा, मनोचिकित्सक

विभाग : गैप पूरा करने को विशेष सत्र जरूरी

शुरुआती कक्षाओं में पाठ्यक्रम पढ़ाई महत्वपूर्ण नहीं होती। बच्चे आचार-व्यवहार, उठने-बैठने, बोलने आदि जैसी क्रियाएं सीखते हैं। प्री-प्राइमरी में लर्निंग गैप पूरा करने के लिए अलग से सीखने-सिखाने के सत्र की जरूरत होगी। शिक्षा विभाग ने बड़ेे बच्चों के लिए कैचअप कोर्स तैयार किया है। -अब्दुस सलाम अंसारी, डीईओ

स्कॉलर : क्या हुआ इस पर कराएंगे स्टडी

पिछले वर्ष और इस वर्ष अब तक स्कूल नहीं जाने वाले बच्चों के सीखने-समझने के तरीके और व्यवहार में बदलाव जैसे पहलुओं को सामने लाने के लिए स्टडी कराई जाएगी। शोधार्थियों की एक टीम गठित होगी। घर पर बच्चों में सीखने की स्कूल जैसी प्रवृत्ति नहीं विकसित हो पाती है। -डॉ. दिलीप कुमार, राजनीति विज्ञानी

छोटे बच्चे के लिए ऑनलाइन पढ़ाई कारगर नहीं, क्योंकि

1. स्क्रीन से पढ़ना मुश्किल होता है, ज्यादा देर एक जगह स्थिर नहीं बैठते हैं 2. ऑनलाइन शिक्षण में केवल किताबी ज्ञान दिया जा सकता है, बच्चों को स्कूल का माहौल नहीं दिया जा सका। 3. विद्यार्थियों का मूल्यांकन संभव नहीं है। 4.विद्यार्थियों को होम वर्क दे दिया है तो उसे जांचने में बहुत दिक्कत आती है 5. ऑनलाइन शिक्षण में टीचर बच्चे पर पूरा ध्यान नहीं दे पाती। ना ही छोटे बच्चों की आदतों के बारे में पूरा पता चलता है। 6. बच्चे पढ़ाई को गंभीरता से नहीं लेते हैं। 7. स्क्रीन टाइम बढ़ने से आंखों में दिक्कत।

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