बागाें में जाकर सुझाव देंगे विशेषज्ञ:लीची काे नुकसान पहुंचा रहे हैं स्टिंक बग कीट बेहतर फल के लिए तत्काल उपचार करें किसान

मुजफ्फरपुर8 महीने पहले
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  • मुजफ्फरपुर और प. चंपारण के बागाें में बढ़ रहा प्रकाेप

लीची बागाें में स्टिंक बग कीट का प्रकाेप इस बार तेजी से हाे रहा है। यह उत्पादन काे बुरी तरह प्रभावित करेगा। पहले मुजफ्फरपुर के कई बागाें और अब पूर्वी चंपारण जिले के मेहसी से राष्ट्रीय लीची अनुसंधान केंद्र के वैज्ञानिकों को इसकी जानकारी मिली है। इसे लेकर वैज्ञानिकों ने किसानाें काे तत्काल इन कीटों का उपचार कराने की सलाह दी है। कहा है कि उपचार कराने पर ही बेहतर लीची हाेगी। साथ ही किसानों के आग्रह पर राष्ट्रीय लीची अनुसंधान केंद्र, मुजफ्फरपुर के वैज्ञानिकों ने चिह्नित लीची बागाें में जाकर स्थिति का आकलन करने का निर्णय लिया है। इस दाैरान वे किसानाें काे स्टिंक बग समेत अन्य कीड़े व बीमारियों को नियंत्रित करने के जरूरी उपाय बताएंगे। केंद्र के निदेशक डॉ. एचडी पांडे ने किसानाें से कहा है कि वे वैज्ञानिक-विशेषज्ञाें से सुझाव लेकर तत्काल इन कीटाें का उपचार कराएं।

जानिए क्या है स्टिंक बग कीट
स्टिंक बग को बदबूदार कीट भी कहा जाता है। इसका वैज्ञानिक नाम टेसारोटोमा जावानिका है। यह आमतौर पर अप्रैल के अंतिम सप्ताह से लीची पर दिखाई देता है और अगस्त के बाद गायब हो जाता है। इसका रंग लीची की शाही किस्म में मंजर निकलने के समय के रंग से मेल खाता है। यह झुंड में हाेता है और नवोदित पत्ते-कलियाें-फल से रस चूस लेता है। इससे फूल व फल पेड़ से टूट कर गिर जाते हैं। युवा टहनियों के उत्तक क्षय होने से टहनी का शीर्ष भाग सूखने लगता है। फल काले पड़ जाते हैं।

सबसे पहला उपचार कि पेड़ से कीट काे गिराएं और जमीन में दबा दें

इस कीट के मादा में अत्यधिक जनन क्षमता होती है। ये लीची काे 80 प्रतिशत से भी अधिक नुकसान पहुंचाते हैं। इसका प्रकोप शुरू हाेने पर ही किसान लीची के डंठल को हिलाएं और गिरी हुई प्रौढ़ कीटों को इकट्ठा कर जमीन में दबा दें। जहां अधिक प्रकोप है या पिछले साल था, वहा ट्राइजोफाॅस 40 ईसी. (1.5 मिली) के साथ थियाक्लोप्रिड 21.7 एससी (0.5 मिली) व स्टीकर (0.3 मिली) को प्रति लीटर पानी की दर से घोल बनाकर बागों में छिड़काव करें।

यहां से ले सकते हैं सुझाव

डॉ. विनोद कुमार, प्रधान वैज्ञानिक (पौध सुरक्षा) - 9162601559 डॉ. संजय सिंह, वरिष्ठ वैज्ञानिक (फल विज्ञान) - 9546891510 डॉ. एसडी. पांडेय, अनुसंधान केंद्र के निदेशक - 9835274641

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