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आप खुत गढ़ें किस्मत:नई तकनीक से प्रति एकड़ 8 नहीं, 18 टन होगा लीची उत्पादन, ~30000 अनुदान भी

मुजफ्फरपुर2 महीने पहले
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को रोना में कामकाज ठप रहने के कारण परेशान हैं और अपनी जमीन रहते कुछ सोच नहीं पा रहे हैं तो यह गलत है। मुजफ्फरपुर की पहचान, यानी लीची के कारोबार से आप कुछ साल में सारी परेशानियों को हरा-भगा सकते हैं। खासकर, अगर तिरहुत प्रमंडल के मुजफ्फरपुर, सीतामढ़ी, शिवहर, वैशाली, पूर्वी व पश्चिमी चंपारण या समस्तीपुर में बागान के लिए जमीन है तो फायदा ज्यादा। फायदा कई गुणा होने वाला है, क्योंकि नई तकनीक से एक एकड़ में 8 टन की जगह 18 टन लीची का उत्पादन होगा। इसके अलावा जलजमाव वाले क्षेत्रों में माउंट पद्धति से बाग लगाने की योजना भी कृषि वैज्ञानिकों की मदद से जमीन पर आ चुकी है। मतलब, जिन इलाकों में बाढ़ का पानी 20 दिन तक टिक भी जाता है, वहां लीची के पेड़ बर्बाद नहीं होंगे। बिहार अभी पूरे देश की 45.6 फीसदी लीची का उत्पादन कर रहा है और विदेशों तक मांग के कारण इसे बढ़ावा देने के लिए राज्य सरकार प्रति एकड़ 30 हजार रुपए का अनुदान भी दे रही है। 7 जिलों में वैकल्पिक खेती के रूप में लीची उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए राष्ट्रीय लीची अनुसंधान केंद्र ने विशेष पहल की है, लेकिन अन्य जिलों में भी फायदा मिलना संभव है। बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में माउंट सिस्टम से मेड़ बनाकर लीची के पौधे लगवाए जा रहे हैं। नए क्षेत्रों में 20 के बदले 8 फीट की दूरी पर हेग्रो सिस्टम से लीची के बाग लग रहे हैं। इससे लीची का प्रति एकड़ औसत उत्पादन 8 टन से बढ़कर 18 टन हो जाएगा। पुराने बागों का जीर्णोद्धार करा तीन वर्ष बाद ही दोगुना उत्पादन लेने के लिए भी तकनीकी तौर पर योजना चल रही है। हेग्रो सिस्टम में बाग लगाने की सलाह के साथ पौधे भी उपलब्ध कराए जा रहे हैं। इस पद्धति से अब 8 गुना 4 मीटर पर लीची का पौधा लगाने से प्रत्येक एकड़ 40 की जगह 120 पौधे लग रहे हैं। इसके अलावा बाढ़ प्रभावित इलाकों में जिस माउंट पद्धति को विकसित किया गया है, उसमें किसान चाहें तो मेड़ पर लीची लगाने के साथ छोटे-छोटे तालाब बनाकर मछली-मखाना का उत्पादन कर सकते हैं।

सही समय यही, ट्रेनिंग से अच्छी आमदनी का रास्ता बनाएं खुद

हेग्रो सिस्टम, माउंट पद्धति तथा जीर्णोद्धार के बारे में अभी उत्तर बिहार के अधिकतर किसानों को जानकारी नहीं है। इसके कारण कृषि से जुड़ाव रखने वाले युवा अपना ग्रुप बनाकर क्षेत्र में स्टार्टअप भी शुरू कर सकते हैं। लीची अनुसंधान केंद्र में 15 युवाओं ने विशेष प्रशिक्षण लिया भी है। ट्रेनिंग के बाद बागों की देखरेख, नए तरीके से बाग लगाने तथा पुराने बागों के जीर्णोद्धार का कार्य लेकर अच्छी आमदनी कर सकते हैं। इसके अलावा लीची के पौधों के बीच हल्दी, अदरक, ओल समेत छायादार फसलों की खेती से और अधिक लाभ का रास्ता भी दिखेगा।

अपनी जमीन है तो बेहतर, चाहें तो सस्ती जमीन भी मिल जाएगी

अपनी जमीन होने पर किसान आसानी से नई तकनीक हैग्रो सिस्टम से लीची के बाग लगा सकते हैं। इसके लिए राष्ट्रीय लीची अनुसंधान केंद्र मुसहरी से संपर्क किया जा सकता है। सीधे निदेशक के नंबर 9431813884 पर भी संपर्क कर सकते हैं। अनुसंधान केंद्र द्वारा इच्छुक किसानों को तिरहुत प्रमंडल समेत समस्तीपुर जिले के किसान होने पर अनुसंधान केंद्र के कोकाकोला के साथ चल रहे “उन्नति लीची प्रोजेक्ट” में शामिल किया जा सकता है। सभी सुविधा, तकनीकी सहयोग के साथ पौधा भी उपलब्ध कराया जाएगा।
लाभ अन्य जिलों में भी मिलेगा, पौधे के 100-100 रुपए लगेंगे

प्रोजेक्ट के कुल 7 जिलों को छोड़ किसी अन्य जिले में जमीन है तो भी लीची अनुसंधान केंद्र की ओर से बागीचा लगाने का तरीका, रखरखाव की पूरी जानकारी मिलेगीञ बस, प्रति पौधा 100 रुपए खर्च करने होंगे। इसके साथ एक बुकलेट भी मिलेगा, ताकि प्रत्येक माह की देखरेख की पूरी जानकारी मिले। बिहार के किसी भी जिले में उद्यान विभाग की अनुदान योजना का लाभ लेने के लिए जिले के सहायक निदेशक उद्यान कार्यालय में आवेदन भी कर सकते हैं। बगीचा लगाने पर प्रति एकड़ 30 हजार का अनुदान भी दिया जाता है।

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