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कृषि वैज्ञानिक की सलाह:15 जुलाई तक मूंगफली की बुआई कर एक हेक्टेयर प्राप्त कर सकते हैं 20 से 25 क्विंटल मूंगफली

पूसा24 दिन पहले
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  • मूंगफली की खेती लाभकारी, 105 दिनों में तैयार हो जाती है

हाल के वर्षों पर गौर करें तो बिहार के किसानों का रुझान पारंपरिक फसलों को छोड़कर मूंगफली, सोयाबीन, सूर्यमुखी आदि जैसे तेलहनी फसलों की ओर हुआ हैं। मूंगफली तेलहनी फसलों में काफी महत्वपूर्ण फसल मानी जाती है। गुजरात, आंध्र प्रदेश, तामिलनाडू, कर्नाटक जैसे राज्यों के किसान लंबे समय से मूंगफली की खेती कर न सिर्फ बेहतर से बेहतर आमदनी प्राप्त कर रहे रहे है। बल्कि इन किसानों की देखा देखी आज मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश, राजस्थान, पंजाब और बिहार के किसान भी मूंगफली की खेती में काफी रुचि लेने लगे हैं।

ये बातें डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विवि पूसा के अधीनस्थ कृषि विज्ञान केंद्र बिरौली के हेड व वरीय वैज्ञानिक डॉ. आरके तिवारी ने कही। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार की ओर चलाएं जा रहे सामूहिक तेलहन प्रत्यक्षण योजना के अंतरगत बिहार के किसानों को केवीके बिरौली के परिसर में मूंगफली की खेती के बारे में विस्तार से जानकारी दी जा रही है। इसके अलावे केवीके के वैज्ञानिकों द्वारा खासकर समस्तीपुर जिले में मूंगफली की खेती को बढ़ावा देने के लिए किसानों का समूह बनाकर उनके खेतों में मूंगफली का प्रदर्शन भी कराया जा रहा हैं।

कब और कैसी मिट्टी में करें मूंगफली की बुआई

मूंगफली की खेती के लिए अच्छी जल निकास वाली बलुई दोमट या भुरभुरी दोमट मिट्टी काफी उपयुक्त होती हैं। मूंगफली की बुआई किसान 15 जून से 15 जुलाई के बीच कर सकते हैं। उन्होंने बताया कि केवीके द्वारा मूंगफली की धरनी प्रजाति का बीज किसानों को निशुल्क उपलब्ध कराया जा रहा है। इसकी फसल 105 दिनों में तैयार हो जाती हैं। खरीफ फसल होने के कारण मूंगफली में सिंचाई की आवश्यकता काफी कम पड़ती है। हालांकि पौधों में फूल आने के समय अगर खेतों की मिट्टी सुखी हुई दिखाई दे तो किसानों को इसमें हल्की सिंचाई निश्चित रूप से कर देनी चाहिए।

मूंगफली में सामान्यतया गुच्छ रोग का होता प्रकोप

कृषि वैज्ञानिक ने बताया कि मूंगफली की खेती में सामान्यतः गुच्छ रोग का प्रकोप अधिक देखने को मिलता है। इस रोग में पौधें बौने रह जाते है और पत्तियो में उत्तको का रंग पिला पड़ने लगता है। इस रोग के लक्षण दिखाई देने पर किसानों को तत्क्षण इमिडाक्लोरपीड नामक दवाई का एक एमएल मात्रा तीन लीटर पानी के साथ घोलकर फसलों पर छिड़काव करना चाहिए। उन्होंने बताया कि सामान्य रूप से जब पौधे पिले रंग के हो जाएं और नीचे की पत्तियां अधिकांशतः गिरने लगे तो किसानों अविलंब फसल की कटाई करा देनी चाहिए। इसके अलावे फलियों को सुखाना चाहिए।

बीजों को उपचारित करने के बाद ही करें बुआई

मूंगफली की बुआई के लिए 1 हेक्टेयर में 80 से 100 किलोग्राम बीज का प्रयोग किया जाता है। इसके अलावे किसान बीजों की बुआई से पूर्व पानी में 2 ग्राम कारबेंडाजीम या मेंकोजेब या थीरम जैसे दवाओं को घोलकर बीज को उपचारित जरूर करें। मूंगफली की बुआई किसान हमेशा पंक्ति में ही करें। पंक्ति से पंक्ति की दूरी 30 सेंटीमीटर एवं पौधें से पौधें की दूरी 15 सेंटीमीटर निश्चित रूप से होनी चाहिए। किसान प्रति हेक्टेयर के हिसाब से 25 किलोग्राम नाइट्रोजन, 50 किलोग्राम स्फुर, 25 किलोग्राम पोटाश एवं 20 किलोग्राम गंधक खेतों की मिट्टी में अच्छी तरह से मिलवा दें।

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