प्रधानमंत्री अलट बिहारी वाजपेयी ने रखी थी पुल की आधारशिला:मिथिलांचल व कोसी के खुले विकास के द्वार

समस्तीपुर2 महीने पहले
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परियोजना पर 516.02 करोड़ रुपए हुए खर्च, सुविधा शुरू - Dainik Bhaskar
परियोजना पर 516.02 करोड़ रुपए हुए खर्च, सुविधा शुरू
  • 86 सालों बाद मिथिलांचल व कोसी के बीच स्थापित हुआ सीधा रेल संपर्क
  • 16 सालों में बना सुपौल-निर्मली रेलखंड के कोसी नदी पर 1.88 किमी लंबा रेल पुल

86 सालों बाद मिथिलांचल व कोसी के बीच सीधी रेल संपर्क स्थापित हुआ। निर्मली- सुपौल रेलखंड के सरायगढ़- आसनपुर कुपहा के बीच कोसी नदी पर 1.88 किलोमीटर लंबा बने इस पुल के निर्माण के साथ ही इसके विकास के द्वार खुल गए। वर्ष 1934 में कोसी नदी पर बना मीटर गेज का रेल पुल भूकंप में ध्वस्त हो गया था। तब से कोसी व मिथिलांचल के बीच सीधी रेल सेवा ठप थी। दोनों क्षेत्र के लोगों को भाया समस्तीपुर, खगड़िया होते हुए आना-जाना करना पड़ता था। पुल बनने से सरायगढ़ के लोगों को आसनपुर की ओर जाने के लिए दरभंगा-समस्तीपुर- खगड़िया - मानसी - सहरसा होते हुए 298 किलोमीटर का सफर तैय करना होता था। अब 22 किलोमीटर की दूरी हो गई। पहले दो दिनों का समय लग जाता था।

अब दिन भर में कई-कई बार आने जाने लगे हैं। जिससे इस क्षेत्र में कोरोबार भी विकसित होने लगा है। इलाके का मक्का अब सीधा दक्षिण भारत के लिए बुक होने लगा। माना जा रहा है कि रेलवे के कारण अब यह इलाका कारोबार के मामले में गरीबी के श्राप से मुक्त हो जाएगा। लोगों का कहना है कि इस इलाके में बड़े पैमाने पर लोग मक्के की खेती करते हैं। इलाका दियारा होने के कारण ऊपज भी खूब होती है। लेकिन यातायात का साधन सुलभ नहीं रहने के कारण क्षेत्र के किसान अनाज को विभिन्न मंडियों तक लेकर नहीं जा पाते थे। उन्हें गांव में ही कम कीमत पर अनाज बेचना पड़ता था। अब किसान आसनपुर कुपहा से सुपौल होते हुए भागलपुर तक जाने लगे हैं। कारोबार विकसित होने से उनकी आर्थिक स्थिति में सुधार भी दिखने लगा है। आने वाले दिनों में आसनपुर कुपहा से निर्मली ट्रेन सेवा शुरू होने पर कोसी के लोग सीधा मिथिलांचल के मंडियों में अनाज लेकर पहुंचेंगे।

बताया गया है कि कोसी नदी पर पहले छोटी लाइन की ट्रेनों के परिचालन के लिए रेलवे पुल था। रेलवे के रिकाॅर्ड के अनुसार वर्ष 1934 में आयी प्रलयंकारी भूकंप में कोसी नदी पर बना पुल ध्वस्त हो गया था। पुल के ध्वस्त होते ही उत्तर व पूर्व बिहार के बीच का रेल संपर्क टूट गया था। बाद के दिनों में दोनों इलाकों के बीच रेल संपर्क कायम तो हुआ, लेकिन कोसी नदी पर पुल निर्माण का कार्य अटका ही रहा। इस कारण दरभंगा व मधुबनी को सीधे सुपौल व सहरसा से जोड़ने वाला मार्ग बंद था। जिससे इलाके का विकास थम सा गया।

दोनों इलाके में पहुंचने के लिए लाेगों को करीब 300 किलोमीटर का सफर करना पड़ रहा था। जिससे लोगों की गतिविधि बंद हो गई। लोग सिर्फ इमरजेंसी होने पर ही एक-दूसरे क्षेत्र आने जाने लगे। व्यापार ठप हो गया। जिसका असर लोगों की आर्थिक स्थिति पर पड़ा। गरीबी के कारण इस क्षेत्र के लोगों का बड़े पैमाने पर पलायन भी हुआ। माना जा रहा है कि ट्रेन सेवा शुरू होने पर व्यापार के अवसर बढ़ेगा। जिसके बाद लोगों का पलायन भी रुकेगा। चुकी सकरी-झंझारपुर-निर्मली-सरायगढ़-सहरसा आमान परिवर्तन परियोजना के तहत नए कोसी पुल का रेलवे ट्रैक से अब सरायगढ़ होते हुए सहरसा से जुड़ाव हो गया है। वहीं सहरसा-सुपौल रेलखंड पर रेल परिचालन पहले से ही जारी है।

नए कोसी पुल को सरायगढ़ की ओर से रेलवे ट्रैक से जोड़ दिया गया है। कोसी नदी पर बने नये पुल की कुल लंबाई 1.88 किलोमीटर है और इसमें 45.7 मीटर लंबाई के ओपनवेब गार्डर वाले 39 स्पैन हैं। नए पुल का स्ट्रक्चर एमबीजी लोडिंग क्षमता के अनुरूप डिजाइन किया गया है। सकरी से झंझारपुर तक रेल लाइन तैयार है और कोरोना के पहले चरण के दौरान लगे लाॅक डाउन से पूर्व ट्रेन चल रही थी। पुल के चालू हो जाने से दरभंगा से भी एक रूट और बन गया है। जिसका लाभ दरभंगा, सुपौल दोनों क्षेत्र के लोगों को मिलेगा।

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