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विसर्जन:भाई-बहन के बीच स्नेह-समर्पण का प्रतीक पर्व सामा-चकेवा का किया गया विसर्जन

समस्तीपुर2 महीने पहले
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भाई-बहन के बीच स्नेह-समर्पण और पति-पत्नी के स्वधर्म निर्वाहन का प्रतीक लोक उत्सव का त्योहार सामा-चकेवा का विसर्जन किया गया। कार्तिक शुक्लपक्ष सप्तमी से शुरू इस त्योहार का समापन कार्तिक पूर्णिमा के दिन होता है। विसर्जन के लिए केले के तना को काटकर कच्चे बांस की कमानी,कागज और थर्मोकोल की सहायता से आकर्षक बेरहा लोगों ने बनाया। सबसे आकर्षक बेरहा देखने की ललक लिए महिलाएं-पुरुष,युवक-युवतियों के पहुंचने से रोसड़ा के गंडक नदी के सीढ़ी घाट पर मेला-सा दृश्य था।

बैंड बाजे के साथ गीत गाती महिलाओं की टोली और उसके पीछे ठेला पर लदा बेरहा लिए नदी के घाट पर आ रहे थे। द्वापर युग से प्रारंभ इस खेल के लिए बहने सामा चकेवा, सतभइया, खड़रीच, चुगिला, वृंदावन ,चौकीदार, झाझी कुकुर, साम्य आदि की प्रतिमा बनाती या खरीदकर लाती है। बहने गीत के बाद नकली बने वृंदावन में आग लगाती है। महिलाएं संठी से निर्मित चुगला को गालियां देते हुए उसके दाढ़ी में आग लगाती है। आठ दिनों के सामा चकेबा पर्व में बहनें भाई की लंबी उम्र की कामना करती आ रही थी।

रोज रात में भाई के नाम से पारंपरिक गीत गाती थी। इसके बाद हर दिन थोड़ा-थोड़ा चुगला को जलाया जाता था ताकि भाई बुरी नजर से बच सके। कार्तिक पूर्णिमा के दिन सामा चकेबा की पूजा के बाद भाई को चूड़ा-गुड़ और लड्डू दिया गया। इसके बाद बहन सामा और चकेबा को पीला वस्त्र पहनायी। चूड़ा-दही और गुड़ खिलाकर विदाई की। विसर्जन के पूर्व भाई अपने घुटने से सामा चकेबा की मूर्ति को तोड़ने के बाद बहन और भाई मिलकर सामा चकेबा को नदी,तालाब आदि में प्रवाहित किया गया।

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